कर्म की गति

​कर्मों की गति का लेखा-जोखा कौन पता कर पाता है

तू जो चाहे बिगड़ी बना दे तू ही सबका दाता है

-लोग कहें ये अच्छा-बुरा है सबको तू भरमाता है

दिल की बातें घटनाक्रमों को तू ही सुनता समझता है

- किस किस को हम देते सफाई जो हुआ अच्छा ही 

   हुआ

कैसे एक घने बरगद का पत्ता पत्ता अलग हुआ

-तुम चाहे जितना भी चाहो मर्जी तुम्हारी होती नहीं

किस्मत के सब खेल निराले तू कब क्या दे दे पता नहीं


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