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मेरी दादी--397

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जवानी की जद्दोजहद में जो मां अपने बच्चों को जी भरकर दुलार न सकी क्योंकि बहुत सारी जिम्मेदारियों की चादर जो ओढ़ रखी थी उसने बच्चों की परवरिश और इच्छायें पूरी करते-करते अब थक गई थी वो लेकिन ये क्या.....? फ़िर से एक नया उल्लास फ़िर से बचपन में लौट आने की लालसा फ़िर से उछल-कूद करने का मन जीवन के प्रति अपनापन एक बार फ़िर लौट आया है पता है क्यूं...... क्योंकि.... वो अब दादी बन चुकी है उन मासूम से-प्यारे से बच्चों की दादी जिनकी रगों में कहीं उसका ख़ून भी दौड़ा करता है भरा-पूरा परिवार, पीठ और कन्धों पर झूलते नन्हें परिन्दे जो चारों तरफ से दादी दादी चिल्लाते हुए लिपट जाते हैं उससे और वो कलेजे से लगाकर उन्हें कहीं अतीत में खो जाती है ऐसी है मेरी दादी जब वो ब्याह कर आई थी इस घर में छोटी थी वो दिल से भी और मन से भी लेकिन ससुराल में तो सभी उससे बड़े थे सासू मां दादी मां जिठानियां और सभी लोग दादाजी बाहर चारपाई पर बैठे चौपाल जमाया करते राह आने जाने वालों को बुलाकर चाय पिलाया करते चाय का भगोना हर समय अंगीठी पर चढ़ा रहता इतना सारा काम फ़िर भी सभी को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास प...

फलों से लदे हुए वृक्ष की--396

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फलों से लदे हुए वृक्ष की एक डाली का अचानक से टूट जाना बहुत ही तकलीफ़ देह होता होगा उस वृक्ष के लिए जिसने ताउम्र अपने इस बोझ को रोकर या ख़ुश होकर ढोया था डाली का क्या......? उस पर एक चिड़िया ने आकर बसेरा बना लिया बस फ़िर क्या था......? फलों को लूटकर खाने की डाली को खींचकर ले जाने की होड़ मच गई होगी भीड़ में जिसके हाथ जो लगा उसने उसी को भुनाया लेकिन....... उस दरख़्त के हाथ क्या लगा सोचने की बात है जो सदियों से अब तक उत्तर पाने की प्रतीक्षा में है !!                           @शशिसंजय

सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-15

जब हम महिला जेल में पहुँचे तो सभी बहनों ने तैयारी कर रखी थी, अब उनमें से कुछ बहनों ने भजन सुनाये।बहुत ही भावविभोर होकर गाती थीं।शायद दुख में भगवान के साथ संबंध ज्यादा गहरा हो जाता है।कुछ आगे बैठने को लेकर झगड़ने लगती, तो दूसरी बहनें उन्हें शांत करतीं।बीती बार जिस ख़ूबसूरत प्यारी बच्ची से शीला ने मिलवाया था, कुसमा (परिवर्तित नाम) थी वह।आज बहुत खुश थी वह।अपना मन, अपनी बात कहकर ख़ाली जो कर चुकी थी वो,सब कुछ धीरे-धीरे अच्छा चल रहा था, अब ये सब भी हम सबका इन्तज़ार करने लगीं थीं।हमें भी उनसे मिलने की जल्दी होने लगी थी,इस बार हम उन सभी के लिए प्रसाद के साथ-साथ प्रशासन से अनुमति लेकर गुरुदेव-माताजी की तस्वीरें प्रत्येक बैरक में लगाने के लिए लाये थे। शीला के बच्चे के लिए भी अलग से कुछ खाने का लाये थे। कुछ गुरुदेव की किताबें, आरती, चालीसा आदि, ताकि जो बहनें पढ़ी-लिखी हैं,वे बाद में भी पढ़ सकें। कार्यक्रम के बाद सभी से पूछा कि क्या अब अगली बार हवन करें ?  कुछ तो समझती थीं,लेकिन जो नहीं समझ पाईं उन्होंने भी हामी भर दी ।अब अगली बार हवन के सामान की व्यवस्था करके लानी थी। मंत्र लेखन की कापियां और...