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मई, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

साधक(सामाजिक)-98

साधक कहते हैं जो ख़ुद को कभी साधना का मर्म ना जाने दुखियारों का दु:ख ना पूछे अंहकार बस रहे हैं पाले सीना ताने चलते हैं वो अनुशासन सब को सिखलाते ख़ुद अनुशासन सीख ना पाये बड़ी-बड़ी बातें बतलाते दम के बल पर-धन के बल पर जो तुम आये हो इठलाते मरते दम तक सुधर न पाये संग में कुछ ना ले जा पाये छोड़ यहीं पर सब जाना है फिर काहे का घमंड दिखाना मरने के बाद सूक्ष्म शरीर से फिर आपस में सब मिलने आना                  💔💔🖤💔💔

प्रेम गली(आध्यात्मिक)-99

प्रेम गली में रहकर भी तू बाहर गलियन में भागत है मन को क्यों भटकावत बैरी तू बार-बार क्यों जावत है प्रेम पियारा भीतर बैठा तुझको भीतर ही बुलावत है भीतर की सुध छोड़ के बन्दे तू बाहर में क्यों भागत है  जो कुछ है सो भीतर ही है छद्मवेष सब बाहर हैं तू ना जाने तू ना माने ये तो सब जग ज़ाहिर है भीतर ही सब बात बनत है तू बाहर ही भटकत है प्रीतम तेरी राह तकत है तू भीतर क्यों ना जावत है               👣🙏🏻

दिले शायरी -20

--जब दिल को अपना विश्वास होता है   बीते समय का कुछ ख़याल होता है   कोई कितनी भी धूल उड़ाये   उसका सभी एहसास बेकार होता है --किसी के कहने से कुछ हो नहीं जाता    बदनाम करने से वो बदना...

सजदा(आध्यात्मिक)-100

सजदा किया जब चरणों में तेरे मुझको जाने क्या महसूस हुआ अजब तरंगें अजब सी ख़ुशबू  जिनका अच्छा सा भान हुआ ग़ज़ब की ठंडक अजब सी गर्मी मुझको कैसा ये अहसास हुआ छोड़ी जो तुमने शक्ति तुम्हारी मेरा तभी तो ऐसा हाल हुआ मुर्दे की सी अकड़ का मुझमें जब-जब भी सँचार हुआ तब-तब तुमने आकर मुझको अपने हाथों प्यार से छुआ  हाथ तुम्हारा मेरे सिर पर यूँ ही हमेशा बना रहे मेरे दाता प्यार की पुलकन अकड़ को मेरी मिटाती रहे                 👣🙏🏻

ख़ुद -ब-ख़ुद(सामाजिक)-101

ख़ुद -ब-ख़ुद आकर तुम जुड़ते चले जाते हो ना जाने कितनी परेशानियॉ अपनी बताते चले जाते हो धीरे से ही सही-दु:ख से ही सही अन्दर तक दिल के गहरे चले जाते हो दुनिया रुसवाई करे तो दु;खी हो जाते हो जब तुम ख़ुद ही रुसवाई करो तो खूब ख़ुश हो जाते हो पीठ के पीछे से जो भोंकते हो खँजर लौटकर फिर वो ही खँजर तुम ख़ुद भी खाये जाते हो सोचते नहीं हो यहॉ सब लौटकर ही आता है बोते जो बीज तुम औरों के लिये वक़्त की मार के साथ तुम ख़ुद ही उसके फल खाये जाते हो                   💔💔🖤💔💔

आप आयें(आध्यात्मिक)-102

आप आयें या न आयें  दिल में बसाये रखियेगा जब भी मुझको याद सताये  दिल में ही मुझको दिखियेगा अन्तर्मन में जब साज बज उठें तब संग में आप भी रहियेगा ज्यों-ज्यों भाव हिलोरें जागें मुझको सँभाले रखियेगा राग-द्वेष से बचकर निकलूँ हाथ को पकड़े रहियेगा लोभ-मोह की चादर को  दूर ही मुझसे रखियेगा भाव कभी भी बिगड़ न पायें मन ऐसा बनाये रखियेगा सत्कर्मों की बाढ़ बढ़ी रहे बस ऐसे ही चलाये  रखियेगा                    👣🙏🏻

ना कुछ लेना(सामाजिक)-103

ना कुछ लेना ना कुछ देना फिर क्यूँ तुम सब इतराते हो देखके शक्लें आपस में तुम क्यूँ इधर-उधर छितराते हो एक पिता की सन्तानें सब फिर है ये कैसा इतराना मात-पिता के गुण ना आये तो ये व्यवहार बड़ा बचकाना काम भले ही कितना कर लो गुरुसत्ता ही सबसे कराती है "मैं" का अंहकार तुम पालो दुर्बुध्दि ये सब भरमाती है मात-पिता हैं बड़े ही निराले सारा तमाशा देखा करते हैं ऐसी सन्तानें देख के वो भी दु:ख के घूँट पीया करते हैं               💔💔🖤💔💔

शिकायत(आध्यात्मिक)-104

ऐ दिल तूने तो शिकवा या शिकायत भी नहीं की कितना भी कहा या  सुनाया हो तुझे तेरे बन्दों ने दरअसल धोखे में जीता  रहा तू भी ज़िन्दगी भर कि सभी तो तेरे अपने हैं  फिर किसको क्या कहूँ  सच तो ये है कि न कोई  अपना न कोई पराया है सलाम उसी को जिसका  आफ़ताब उग आया है डूबते सूरज को कब  किसने सलाम ठोंका है बुझते हुये चिराग़ को  बुझने से किसने रोका है                            👣🙏🏻

कैसे कहू(आध्यात्मिक)-105

कैसे कहूँ कि तुम मुझसे दूर हो गये हो रहते हो आस-पास ही महसूस होता है मुझे जब-जब पुकारा है तुम्हें दिल की गहराइयों से बिन बोले भी सदा पहुँची तुम्हारे पास तक बेशक...रूबरू होते नहीं नज़दीक तुम रूह से रूह का रिश्ता तुम्हारा है अलग रूह में मुझको बिठाकर प्यार से दुलार कर मुझको तुम जोड़े ही रखना प्रेम के इस पाश में                           👣🙏🏻

युग बदलने की(आध्यात्मिक)-107

युग बदलने की राह अाज दिखने लगी है गूँज क्रान्ति की अब सुनाई देने लगी है --शान्ति से बढ़ाते रहे बालकों को आप भी    सदबुध्दि की प्रार्थना में जुट गये हैं सभी    हाथो में हाथ लेके चलना सबको सिखाते रहे     सामूहिक साधना करने का प्रभाव बतलाते रहे छोड़ी जो चिंगारी उजियारा बनने लगी है गूँज क्रान्ति की अब सुनाई देने लगी है --समानता का भाव सबके दिलो में उतार दिया    जाति-पॉति भेद-भाव सब दूर तक मिटा दिया    सभी सन्तानों को कर्म से ब्राह्मण बना दिया    नारी सदी आने का उद्घोष भी करा दिया नारियॉ अब क्रान्ति गीत गाने  लगी हैं गूँज क्रान्ति की अब सुनाई देने लगी है --युवा नर-नारी सब आगे-आगे बढ़ चले   अँधियारे को चीरकर प्रकाश फैलाते चले     प्रौढ़ जन आस-पास प्यार बॉटते चले      बच्चे-बुज़ुर्गों को अपने साथ ले चले  हिलोरें आज प्यार की उमड़ने लगी हैं   गूँज क्रान्ति की अब सुनाई देने लगी है                            👣🙏🏻

पिंजरा(सामाजिक)-108

(राह गर्दिशों में हरदम) पिंजरे से निकल के पँछी,भागा जहॉ से आया पिंजरे को छोड़ ख़ाली,दुख से वो गाता आया तूने ज़िन्दगी गुज़ारी,झगड़े-फ़साद करते कुछ अच्छे काम ख़ुद से,जीवन में कर न पाया पिंजरे को------- अब पीटता है सिर को,ऐसा बिलखता है वो एक बार मौक़ा फिर से,वो मॉगता ही आया पिंजरे को---- ग़र दे भी दें वो मौक़ा,दुनिया में जन्मने का तू फिर से भूल जाये,क्या काम करने आया पिंजरे को----                              👣🙏🏻

मैं तेरे चरणों(आध्यात्मिक)-109 

मैं तेरे चरणों का फूल हूँ,और तेरे दर की धूल हूँ साये में तेरे रह सकूँ,एक ऐसी रहगुज़र में हूँ मेरा आज तुमसे सँवर गया,चरणों में आके बस गया अब तू जो चाहे निखार दे,मैं तेरी फ़स्ल-ए-बहार हूँ कहते हैं तुझको पीर भी,तूने कितने सँवारे आज भी मुझको भी आज सँवार दे,तेरे दर पै पड़ा मैं आज हूँ तुम ख़ुदा के भेजे दूत हो,ख़ुदा से तुम भी कम नहीं  जो चाहो मुझको बना दो तुम,तक़दीर तेरे हाथो में है                                     👣🙏🏻

तेरे दर पै(आध्यात्मिक)-110

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तेरे दर पै जो आये सवाली झोली भर  दो मॉ सबकी भवानी तेरे दर पै------ तेरे दर पर भरे भँडारे, लोग ले-लेके भर-भर के जाते एक कन्या कुँवारी है दर पै उसको वर दे दो माता भवानी तेरे दर पै------ तू तो देती ही रहती है सबको बच्चे आते हैं दर पर इसी से एक मॉ की गोदी है सूनी बच्चा दे दो तुम माता भवानी तेरे दर पै------ तेरे दर पर जो भी भक्त आते ख़ाली हाथ कभी ना वो जाते सबके रोगों को कष्टों को हर लो दीन-दुखियों को सुख दो भवानी तेरे दर पै----

जीवन(सामाजिक)-111

जीवन में जीवट का होना  कितना ज़रूरी होता है जीवट के अभाव में बन्दा बेचैन हुआ ही करता है बड़े-बड़े शहरों के बन्दे सारे कितनी-कितनी मेहनत करते हैं चिड़ियों की आवाज़ से उठते हैं और काम पर अपने चल पड़ते हैं पेट की ख़ातिर ही हर बन्दा काम से अपने जुड़ा हुआ है दौड़-भाग कर जीवन की वो नैया पार किया करता है बालकनी में सुबह-सुबह जब कभी खड़ी हो जाती हूँ मैं  आगे-पीछे बैग लटकाये हँसते-जाते बच्चों-बड़ों को देखा करती हूँ मैं  थककर चूर मुँह लटकाये आते   रात को सबको देखा करती हूँ  जीवन में दौड़-दौड़ कर मर जाना सबका क्या? ये ही जीवट सोचती हूँ                 💔💔🖤💔💔

दिल्लगी(आध्यात्मिक)-112

ये कैसी दिल्लगी है  ये कैसा मेरा पागलपन है तुझसे मैं बातें करती हूँ  जैसे सुनता तू सब कुछ है तू तो वैसे भी सुनता है  हर पल बक-बक करती हूँ तेरे प्यार को तेरी डॉट को  हर छिन अनुभव करती हूँ मुझको ये धोखा हो जाता  पास में मेरे तुम बैठे हो झट से मैं भी पूँछ उठती हूँ  दाता तुम अब कैसे हो तुम तो अच्छे ही होगे बस  हाल हमारा बुरा हुआ तेरे जाने के बाद से मेरा  हर पल ही बदहाल हुआ कितनी तमन्ना कितनी यादें  दिल में सँजोकर रखी हैं भूली-बिसरी यादों की टोकरी  तुमने अब भी ताज़ा कर रखी है                         👣🙏🏻

मन की बगिया(आध्यात्मिक)-113

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झलक तुम्हारी दिखते ही मन की बगिया खिल जाती है लगता है गुरु और माता दोनों  की डोली आती है देख के गुरुसत्ता की सूरत सबका मनोबल बढ़ता है प्यारी निगाहें पड़ती हैं जब श्रद्धामय सब हो जाता है जोश बराबर भरते रहना आगे सबको बढ़ाते रहना सबके सिर हाथ तुम्हारा अपने गले लगाते रहना आज तुम्हारे तप-बल से  सब आगे बढ़ते जाते हैं शक्ति तुम्हारी काम है करती तब सभी झूमते जाते हैं                

दिल(आध्यात्मिक)-114

दिल में तुम्हारी यादों का दिया बराबर जलता है बाती तो तुम बने हो प्यारे "घी"जैसा दिल जलता है अर्पण क्या कुछ करूँ मैं तुमको ख़ुद को ही तुमको दे डाला सिर से नख तक देखो ग़र अपने ही रँग में रँग डाला चैन नहीं आराम नहीं है कहने को कुछ काम नहीं है तेरे साँचे में ढल जाना  ये भी कोई आसान नहीं है जितने नक़ाब चढ़े थे तन पर एक-एक करके उतारा है इसी तरह से तुमने मुझको कुछ अपने ही ढँग से सँवारा है                    👣🙏🏻

मॉ(व्यक्तिगत)-115

पीछे-पीछे दौड़ लगाना गोदी उठाकर प्यार जताना ज़िद करने पर डॉट लगाना बाद में ज़िद पूरी कर देना बचपन से बड़े हो जाने तक मॉ की नज़र में बच्चा रहना बात-बात पर चिन्ता करना इन्तज़ार में जगते रहना अपने लिये कुछ भी न माँगना  बच्चों पर जान निछावर करना अपनी ख़ुशियाँ भूल-भालकर सबकी ख़ुशी में ख़ुशी जताना ऐसी प्यारी होती है मॉ दूर कहीं से आती है मॉ शायद भगवन व्यस्त हैं होंगे इसीलिये भेजी होगी मॉ           💔💔🖤💔💔

शुकराना(व्यक्तिगत)-116

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सालों-साल गुज़र जाते हैं इक-दूजे का सहारा बनने में  कभी वो रूठें - कभी मैं रूठूँ  अच्छा लगता था मनाने में  लड़ते-भिड़ते,प्यार जताते कैसे गुज़र गये ये साल बच्चे भी अब बड़े हो गये  ठुमक-ठुमक चलते थे चाल बेशक ? उम्र बढ़ी है अब तक बचपन फिर भी ज़िन्दा है उतनी उछल-कूद ना कर पाते  पर मन तो कुलाँचे भरता है अढ़तीस साल साथ हैं गुज़रे  देती हूँ तुम्हें मुबारकबाद  मिलजुल कर हम करते रहें भगवन जो हमसे करायें काज!! शुकराना  ====== शुकराना उस सत्ता का  जिसने ये सब ख़ुशियाँ दीं ख़ुशी में शामिल हुये जो अपने  शुकराना उन सबका भी भले ही माध्यम फ़ोन रहा हो व्हाट्सएप हो या फ़ेसबुक ही दुआयें हमको मिलीं हैं सबकी शुकराना उन प्यारों का भी ख़ुशी में शामिल जो ना हो पाये दिल से दुआयें उन सबको भी गुरुसत्ता सबकी भरे झोलियॉ जिसने भी हमें बधाई दी,दुआयें दीं आप सभी का दिल से आभार व नमन                      🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

ज़िन्दा(सामाजिक)-117

ज़िन्दा हैं जब तक अमन-चैन रहना चाहिये दूसरों से क्या ग़िला ख़ुद को सँवरना चाहिये प्यार की नीयत हमेशा पास रखनी चाहिये नफ़रतों के ढेर से ख़ुद दूर रहना चाहिये मन में जहॉ ख़ुशी न हो जाना वहॉ ना चाहिये दु:ख पड़ने पर दुश्मन के घर पर भी जाना चाहिये कितना भी कोई बात बनाये दिल पर न लेनाचाहिये गुरु से सँबल पाकर ख़ुद की मस्ती में रहना चाहिये                                   👣🙏🏻

नाम तुम्हारा(सामाजिक)-118

नाम तुम्हारा लेकर कुछ तो  बहुत  दिखावा करते हैं पहन प्रभु का चोगा तन पर मन को काला ही रखते हैं छल और कपट,झूठऔर धोखा रग-रग में जिनके छाया है काम तुम्हारा कितना भी कर लें दु:ख से ना कोई जुड़ पाया है देख दु:खी को हँसी उड़ाना किसी तरह अपमानित करना सब पर तरह-तरह के दोष लगाना पहन के चोगा "धर्मात्मा"साबित करना प्रभु साधक के ये गुण तो नहीं हैं तुम तो निश्छल बना देते हो फिर सब क्यों ? ये झूठा दिखावा ? सबके "जी का जँजाल" बनाते हो ?                      👣🙏🏻  

मैली चुनरिया(आध्यात्मिक)-119

मैली चुनरिया कैसे धोऊँ, भगवन मुझे बताओ तुम लगे है धब्बे चाहे जितने, मल-मल उन्हें छुड़ाओ तुम  तुमसे जुड़कर गन्दी चुनरिया ,कैसे उसको ओढ़ूँ मैं जब तक तुम ना करो धुलाई, पास में क...

ऑखिन देखी(सामाजिक)-120

कर्मों की गति समझ न आती बार-बार फिर लौट के आती गुज़री बातें और गुज़री यादें  हरपल आकर क्यों हैं सतातीं काफ़ी सालों पहले देखा था अपने मिलने-जुलने वालों को आज उन्हीं के साथ हो रहे सब सहते कितने अत्याचारों को घर के बच्चे क्यूँ दु:ख देते हैं अपने ही मॉ - बापों को उनका भविष्य भी निर्भर है अपनी ही औलादों पर आज भले ही छोटे बच्चे  कुछ भी समझ ना पाते हो लेकिन कल को बड़े हुये तो वही दोहरायेंगे फिर मॉ - बापों से समझ पड़े तो आज समझ लो तुमको भी बूढ़ा होना ही होगा जो कुछ भी तुमने कल बोया था वो कर्म तुम्हें भी भोगना ही होगा                  💔💔🖤💔💔

सारी व्यवस्था(आध्यात्मिक)-121

सारी व्यवस्था आपने आकर  कितने अच्छी तरह संभाल ली फिर भी मन की "मैं" ना जाती  सोचूँ मुझसे ही दुनिया चलती ज़र्रा-ज़र्रा बयॉ कर रहा आप वहॉ पर हैं मौजूद कहॉ-कहॉ से भीड़ जुटा दी  उत्साह भरा था सबमें खूब किन शब्दों में बयॉ करूँ में  अचरज भी-अनुभूति भी सजदा करूँ शुकराना करती चरणों में तुम्हारे सिर को रखती जनम-जनम के पापों की अब ऐसे ही धुलाई करते रहना जैसी भी हूँ तुम्हारी हूँ बस मुझको अपना बनाये रखना                  👣🙏🏻

तप-बल(आध्यात्मिक)-122

तप-बल आपका शक्ति आपकी पल-पल पर हम पाते जाते हैं तभी तो इधर-उधर न भटक कर दूर अकेले ही चल पड़ते हैं साथ भी सबका मिल ही जाये होता ऐसा कई बार नहीं  सबकी अपनी इच्छाये हैं उन पर किसी का ज़ोर नहीं  चिट्ठी आपकी पढ़ देते हैं जब कोई दुखियारा आ जाता है दिल में बिठाकर तुमकौ अपने सँदेश तुम्हारा ही पढ़ा जाता है चलता रहेगा जब तक ये जीवन  तब तक कुछ भी कराते रहना सॉसें जब रुक जायें काया की अपने हाथों में लेकर के जाना                   👣🙏🏻

आज(आध्यात्मिक)-123

आज बुलावा भेजा गुरुवर,दाता आप पधारना ख़ामियाँ ग़र रह जायें तो,हमको आप मुआफ़ करना सारी सखियॉ आयेंगी,मिलकर तुम्हें मनाने को दाता मेरे आ जाना तुम,सबको ख़ुशियाँ देने को जप-तप-यज्ञ का ज्ञान नहीं,भावों की पूजा करनी है सबके भाव प्रबल कर देना,हम सबमें श्रध्दा भरनी है आशीर्वाद मिले हम सबको,हौसला आप ही भरते हैं आकर आप सँभालेंगे ही,बस ऐसी कामना करते हैं                             👣🙏🏻

दर पर(आध्यात्मिक)-124

दर पर तुम्हारे जो आते सवाली करते हैं सजदा शरण में तुम्हारी वो रौनक़ें बहारा वो शामें सुहानी बहुत याद आती है वो जुड़ती रवानी तलाश-ए-दीद की रहती है ख़ुमारी  तमन्नायें मिलने की होती हैं हमारी आ जाओ फिर से रूबरू हो सकें हम तेरी निगाहें करम को फिर पा सकें हम दिल की लगी को बुझाओ तुम आके करोगे भी क्या अब तुम हमसे दूर जाके                         👣🙏🏻

बदली सी सूरत(सामाजिक)-125

ये बदली सी सूरत,क्यूँ बदले ये तेवर कहीं कुछ है बिगड़ा,कहीं कुछ है सँभला  हमारे जो भीतर में बैठा है बन्दा नहीं है हमारी तरह से वो गन्दा दिखावे की चादर से कब तक ढकोगे यादों के खंडहरों से कब तक जुड़ोगे नये पथ को कैसे भी चुनना ही होगा पुराने खंडहरों को तोड़ना तो पड़ेगा तभी मैल की चादर धुल सकेगी आत्मा भी तभी ख़ुश होकर रहेगी                      👣🙏🏻

अब तो(आध्यात्मिक)-126

अब तो आ भी जाओ मेरे दाता बहुत सताया है तुमको मैंने  दुनिया से जो कह ना पाती वो तुमको खूब सुनाया है मैंने  साधक की परिभाषा क्या है मुझको अब भी समझ न आती जब भी याद सताती है तुम्हारी लिखने लग जाती ये प्रेम की पाती जितने जो पल भी साथ में गुज़रे  उस हर पल को याद मैं करती हूँ ध्यान न करना मुझको आता अब यही ध्यान मैं करती हूँ जप-तप तुमने खूब सिखाया शिष्टाचार भी खूब बतलाया सब-कुछ भूल-भाल कर अब तो याद तुम्हें ही करती-रहती हूँ                  👣🙏🏻

दिल में(आध्यात्मिक)-127

दिल में जो शमा जलाई है  हरवक्त जलाये रखियेगा चरणों में सजदा बना रहे इतनी सी रहमत करियेगा रोम-रोम में अपनी यादों की ख़ुशबू बिखराते रहियेगा अब्सार के ज़रिये इज़हार-ए-मुहब्बत  हमको करते रहियेगा गिरें मुहब्बत के ना ऑसूँ  इतनी हिम्मत देते रहियेगा झँझावातों से घबरा ना जायें ताक़त बनकर रहियेगा ज़िन्दगी जितनी भी दी है क़र्ज़ा चुकवाते रहियेगा भार किसी का सिर पर ना हो छोटी सी गुज़ारिश समझियेगा                   👣🙏🏻

गुरुवर दाता(आध्यात्मिक)-128

गुरुवर दाता तुम्हें छोड़कर  कुछ भी सोच नहीं पाती इसीलिये मैं इधर-उधर की  बातें कुछ भी ना कर पाती इक पल को भी याद न छूटे  ऐसे हमेशा रखना मुझको ध्यान तुम्हारा बना रहे  कुछ ऐसे पल देना मुझको अन्तर के पट खोल के अपने  दरश दिखा देना मुझको मेला झमेला हटा के रखना  छुपाके रख लेना मुझको मन जो सोचे अच्छा सोचे  जिभिया भी अच्छा बोले कर्म बन पड़े अच्छे ही बस  ऐसे तुम रखना मुझको               👣🙏🏻