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क्या याद करूं--412

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क्या याद करूं क्या भूलूं मैं कुछ समझ नहीं मुझको पड़ता बस एक बात जो चलती है दिल पीछे दौड़ चला करता जीवन की अंतिम घड़ियों में क्या खोया है क्या पाया है ये चक्र जो घूमा चारों तरफ तो सोचा सब कुछ खोया है दौड़ा करते कुछ बनने को बन जाने और बनाने को वह सब कुछ पीछे छूट गया अब बैठे घुटने जुड़वाने को है चारों तरफ ही सन्नाटा सब खोया पाया सा लगता है पक्षी जब गूंजा करते हैं संगीत वही मन भाता है उड़ जायेगा मन का पंछी तब और कहीं जा जन्मेगा फिर इसी तरह की व्याकुलता लिए वह बार बार ही जूझेगा !!                         शशिसंजय                          13/5/2020

मदर्स डे--411

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एक कहावत है बहुत पुरानी जो बचपन से सुनता आया हूं जीवित पिता से दंगम- दंगा मरे पिता पहुंचाये गंगा केवल पिता ही क्यूं मां बाप दोनों पर ही चरितार्थ होती है यह कहावत मदर्स डे पर फोटो और कविताओं की धूम मची हुई है फेसबुक वाट्सएप पर जो कभी न याद करते हों आज याद कर लें अमावस्या की तरह.... जिस तरह अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए अमावस्या को खीर का भोग लगाया जाता है कैसी विडम्बना है.... जीते जी तड़पाते रहे अपमान के घूंट पिलाते रहे ग़र जरूरत पड़ी तो शोषण करने से भी नहीं चूके मां बाप के प्रति कर्तव्य भूलकर अधिकार जताते रहे कहां है वो श्रवण कुमार जो मां बाप को कंधों पर बैठाता था आज तो तरसती हैं निगाहें मां बाप की कि कंधा देने वाले हाथ कहां खो गए !!                           @शशिसंजय                               10/5/2020

अमृतवाणी--201

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अमृतवाणी--201 ============ अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग-1)  कर्मफल एक ऐसी सच्चाई है जिसे इच्छा या अनिच्छा से स्वीकार ही करना होगा। यह समूची सृष्टि एक सुनियोजित व्यवस्था की शृंखला में जकड़ी हुई है। क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम कण-कण पर लागू होता है और उसकी परिणति का प्रत्यक्ष दर्शन पग-पग पर होता है। भूतकालीन कृत्यों के आधार पर वर्तमान बनता है और वर्तमान का जैसा भी स्वरूप है, उसी के अनुरूप भविष्य बनता चला जाता है। किशोरावस्था में कमाई हुई विद्या और स्वास्थ्य सम्पदा जवानी में बलिष्ठता एवं सम्पन्नता बनकर सामने आती है। यौवन का सदुपयोग-दुरुपयोग बुढ़ापे के जल्दी या देर से आने, देर तक जीने या जल्द मरने के रूप में परिणत होता है। वृद्धावस्था की मनःस्थिति संस्कार बनकर मरणोत्तर जीवन के साथ जाती और पुनर्जन्म के रूप में अपनी परिणति प्रकट करती है। कुछ कर्म तत्काल फल देते हैं, कुछ की परिणति में विलम्ब लगता है। व्यायामशाला, पाठशाला, उद्योगशाला के साथ सम्बन्ध जोड़ने के सत्परिणाम सर्वविदित हैं, पर वे उसी दिन नहीं मिल जाते, जिस दिन प्रयास आरम्भ किया गया था। कुछ काम अवश्य ऐसे होते हैं,...

अमृतवाणी--200

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हमारी चेतावनी को अनदेखा न करें- अगले दिन बहुत ही उलट-पुलट से भरे हैं। उनमें ऐसी घटनायें घटेंगी ऐसे परिवर्तन होंगे जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगें पर नये संसार की अभिनव रचना के लिए आवश्यक हैं। हमें इस भविष्यता का स्वागत करने के लिए-उसके अनुरूप ढलने के लिए-तैयार होना चाहिये। यह तैयारी जितनी अधिक रहे उतना ही भावी कठिन समय अपने लिये सरल सिद्ध होगा। भावी नर संहार में आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को अधिक पिसना पड़ेगा। क्योंकि महाकाल का कुठाराघात सीधा उन्हीं पर होना है। “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायश्च दुष्कृताम्” की प्रतिज्ञानुसार भगवान को युग-परिवर्तन के अवसर पर दुष्कृतों का ही संहार करना पड़ता है। हमें दुष्ट दुष्कृतियों की मरणासन्न कौरवी सेना में नहीं, धर्म-राज की धर्म संस्थापना सेना में सम्मिलित रहना चाहिये। अपनी स्वार्थपरता, तृष्णा और वासना को तीव्र गति से घटाना चाहिए और उस रीति-नीति को अपनाना चाहिये जो विवेकशील परमार्थी एवं उदारचेता सज्जनों को अपनानी चाहिये। संकीर्णताओं और रूढ़ियों की अन्य कोठरी से हमें बाहर निकलना चाहिए। अगले दिनों विश्व-संस्कृति, विश्व-धर्म, विश्व-भ...