संदेश

जून, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बच्चे(सामाजिक)-66

मुझे हँसते,खेलते,मुस्कुराते  बच्चों को देखकर चिढ़ सी होती है और मैं व्यथित होकर  चुपके -चुपके उन्हें रुला देता हूँ क्यों कि मेरा ऐसा अनुभव है कि जो बचपन में  नहीं रो पाता है वह शेष जीवन में  रोता ही रहता है  उन बच्चों को रुलाकर मुझे असीम ख़ुशी होती है और मैं अपने आपको गौरवान्वित महसूस करता हूँ इसीलिये कि मैं उन्हें शेष सारे जीवन में  रोने से बचा रहा हूँ           💔💔🖤💔💔                 11/1/75

दुनिया(सामाजिक)-67

दुनिया की इस भाग-दौड़ में  रिश्तों का कोई मोल नहीं मतलब के होते हैं रिश्ते दिल से उनका कोई तोल नहीं जब भी ज़रूरत पड़ती है तब उठकर आ जाते हैं ये काम निकल जाते ही फिर से पीठ दिखा जाते हैं ये दिल और मन से दूर ही रखना ऐसे थोथे रिश्तों को उन जैसे ना बन पायें तो भी दूर ही रखना इन घाघों को केवल परम गुरु से रिश्ता वो ही केवल सच्चा है बार-बार हर बार ही जुड़ना केवल ये रिश्ता ही सच्चा है              💔💔🖤💔💔

व्दन्द(सामाजिक)-68

जीवन के हर क्षेत्र में द्वन्द  द्वन्द भीतर और बाहर  द्वन्द अभिलाषाओं और  अपेक्षाओं के बीच द्वन्द लक्ष्यों  और सिध्दान्तों के बीच द्वन्द मेरे और सबके बीच  द्वन्द जीवन और मृत्यु के बीच द्वन्द सपूत और कपूत के बीच द्वन्द विचारों को प्रकट करने  और न करने के बीच द्वन्द.....द्वन्द.....और .द्वन्द....                   मात्र द्वन्द        💔💔🖤💔💔           11/1/75

झूठ सॉच(सामाजिक)-69

झूठ सॉच और तेरी मेरी से ख़ुद को बचाते जाइयेगा कितनी भी अड़चनें जो आयें सबको मिटाते जाइयेगा अन्दर की ताक़त का ज़र्रा  बाहर निकलने दीजियेगा सहम सहम कर जीने से जीवन को बचाते जाइयेगा खुलकर सच को कहने की आदत को बनाये रखियेगा चिकनी चुपड़ी बातों से बस अपने को बचाते जाइयेगा कोई रूठे और कोई छूटे दाता को मनाये रखियेगा सबके दिलों की चिंगारी को  प्यार से जलाये रखियेगा             💔💔🖤💔💔                   24/5/18

हर पल(व्यक्तिगत)-70

कुछ लोग हर पल खोने के बाद कुछ पा रहे हैं मैं हर पल पाने के बाद कुछ खो रहा हूँ वे खोकर पा रहे हैं मैं पाकर खो रहा हूँ मेरे पाने और खोने की प्रक्रिया में  आस्थायें मिट रही हैं भावनायें मर रही हैं प्यार उजड़ रहा है मन रो रहा है जो पाया था खो दिया जो पा रहा हूँ खो रहा हूँ जो पाऊँगा खो दूँगा इसलिये न कुछ पाना चाहता हूँ न खोना             💔💔🖤💔💔                    9/1/75

सोचता हूँ(व्यक्तिगत)-71

सोचता हूँ कभी कभी यदि चलते रहने का नाम ही ज़िन्दगी है......! तो रफ़्तार धीमी का नाम क्या है......! रुक जाने पर यदि ज़िन्दगी की हार है.....! तो लक्ष्य विहीन चलते रहना  क्या है.....! जब राह दिखाई ना दे कोई तो सोचता हूँ कि अपार ख़ुशियाँ क़दम चूमने  वाली हैं.......! विश्वास अडिग जब होता मन में  तब लगता है मुझको कि अब हालात बदलने वाले हैं क्या यही सच है या कुछ और.......!        💔💔🖤💔💔            14/5/18

नहीं मालूम(व्यक्तिगत)-72

अतीत की प्यारी यादें  वर्तमान के कटु अनुभव भविष्य की अनगिनत कल्पनायें कौन सुखद हैं इनमें  नहीं मालूम मुझे जानने की जिज्ञासा भी नहीं  मात्र अभिलाषा इतनी सी कि कलापूर्ण जीवन जीया जाये स्वतन्त्र,समग्र,उन्मुक्त  बिना किसी हस्तक्षेप व बन्धन के लेकिन जीवन क्या है... अतीत की प्यारी यादें  वर्तमान के अपने अनुभव भविष्य  की अनगिनत कल्पनायें या फिर कुछ और....? नहीं मालूम मुझे उत्सुकता भी नहीं  सभी कुछ मालूम करने की           💔💔🖤💔💔                 17/7/77

रँग-बिरँगी(व्यक्तिगत)-73

रँग-बिरँगी छोटी सी चिड़िया बगिया में अक्सर आती है चीं चीं चूँ चूँ की आवाज़ से वो मन को लुभाया करती है उसे देखकर मस्त गिलहरी अपनी आवाज़ सुनाती है उसे लग रहा प्यार बँट रहा उसका वो सबको आके उड़ा जाती है बिल्ली का बच्चा देख के सबको उछलकूद करने लगता है मुझको प्यार नहीं करती तुम पँजों से मुझे बतलाता है बाहर सारा दृश्य देखकर शेबू भी भों-भों करता है उसको लगता मैं ही अकेला बाक़ी को प्यार मिलता है देख के इनकी भाव दशायें मन भी कुछ सोचा करता है कितना निश्छल प्यार है इनका जो वाणी से बोल न पाता है              💔💔🖤💔💔                    24/5/18

मेरे मन(व्यक्तिगत)-74

मैंने कहा था न ! कि तूफ़ान आयेगा.... ओर तुम बह जाओगे.. मगर तुमने नहीं सुना मैंने तुमसे कहा था न ! कि वह बेवफ़ा है... व्यर्थ ही छले जाओगे.., मगर तुम हँस दिये मैंने तुमसे कहा था न ! कि ज़माना ख़राब है... दर दर की ठोकरें खाओगे... मगर तुम टाल गये मैंने तुमसे कहा था न ! कि वह अप्राप्य है... यूँ ही थक जाओगे... मगर तुम चल दिये.. हॉ,यह बात और है कि तुमने तूफ़ान को लौटा दिया कि तुमने उसे ही छल लिया कि तुम जमाने से जीत गये कि तुम पार पहुँच गये.... कि तुमने उसे पा लिया... और मैं... खड़ा देखता रह गया             💔💔🖤💔💔                    12/12/78

फ़लसफ़ा(सामाजिक)75

फ़लसफ़ा है जीवन का बस काम करते जाइये कोई बोले या ना बोले बस आप मुस्कराइये आगे-पीछे क्या होता है अनदेखा करते जाइये लक्ष्य को अपने आगे रखकर आगे बढ़ते जाइये सामने आ जायें जो भी सेवा करते जाइये दुखियारों के मुखड़े पर ख़ुशियाँ देते जाइये जितना भी बन पड़े....  अच्छे कर्म करते जाइये                   👣🙏🏻                 22/5/18

अजब दस्तूर(सामाजिक)-76

अजब दस्तूर है  दुनिया का मन में कुछ और दिल में कुछ और फिर भी.... चेहरे पर ख़ुशी की लहर लहराते हुये औपचारिकता खूब जाती है निभाई पहली बार मिलते हैं और यह कह देते हैं कि आपसे मिलकर  बड़ी ख़ुशी हुई         💔💔🖤💔💔             28/10/77

डायरी(व्यक्तिगत)-77

कुछ पन्नों में  अतीत की स्मृतियॉ ख़ुशी के पल ग़मों की यादों के  धुँधले से दृश्य और भी ना जाने कितनी बातों का इतिहास दर्ज है.... जब कभी मन होता है पढ़ने बैठ जाती हूँ उस बीते हुये कल को जिसमें सभी कुछ खो सा गया है मेरी ख़ुशियाँ और मेरे ग़म  आज का दिन कल अतीत बन जायेगा लेकिन सारा विवरण  याद दिलाती रहेगी ये डायरी.... बटोरने को अतीत के कुछ..... धुँधले से क्षण           💔💔🖤💔💔              27/10/77

लेन देन(सामाजिक)-78

दुनिया के रिश्ते लेन देन वो गर्भ में बच्चा लेन देन दुनिया में आया लेन देन मॉ बाप से रिश्ता लेन देन स्कूल में शिक्षा लेन देन कॉलेज में जाना लेन देन शादी हो जाना लेन देन पति पत्नी का रिश्ता लेन देन सब फ़र्ज़ निभाना लेन देन सब क़र्ज़ चुकाना लेन देन सब करते जाना लेन देन दुनिया से जाना लेन देन बस गुरु का रिश्ता पक्का है बाक़ी का रिश्ता कच्चा है पर मन ना समझे बच्चा है              💔💔🖤💔💔                22/5/18

तेरी चाहत(आध्यात्मिक)-79

तेरी चाहत तेरा प्यार ही मुझको चलाये जाता है ना कुछ क़ाबिल हूँ मैं प्यारे तू ही बढ़ाये जाता है ऊँगली के नाखूनों से तुमने मुझे सहारा दे रखा है इसी सहारे चलकर ही तुमने मुझको आते देखा है जीवन की इस नैया को तुम कब से सँभाले आये हो पिछला कुछ भी याद नहीं  तुम ही बतलाते आये हो अन्त समय तक थामे रखना हाथ जो पकड़ा है तुमने सब कुछ छोड़ तुम्हीं पर निर्भर अपने को कर रखा हमने                   👣🙏🏻                 20/5/18

ऑसूँ(व्यक्तिगत)-80

ऑसूँ भी क्या चीज़ हैं ? चाहे ज़रूरत हो या न हो लेकिन उन्हें बाहर आना ही है थोड़ी सी ख़ुशी  या चुभन होने पर तुरन्त ही बाहर निकल आना जी चाहे या न चाहे  लेकिन उन्हें अपना कार्य करना सोचती हूँ ? मेरे दाता काश तूने ये ऑंखें ही न बनायी होती साथ ही न ये ऑसूँ होते जो अपने मन की व्यथा को तुरन्त ही बाहर निकलकर  व्यक्त कर देते हैं गिरते हुये ऑसुओं की भला क्या क़ीमत ? सिर्फ़ इतनी कि किसी भी दु:ख में गिरा ऑसूँ  अश्क़ नहीं होता लेकिन जो... दूसरों के ग़म को देखकर गिरे वह ऑसूँ  एक मोती ही होता है          💔💔🖤💔💔               14/12/77

अतीत(सामाजिक)-81

अतीत को भूलना आसान नहीं होता आख़िर क्यों  बुरे अतीत के साथ  चिपके रहने से ज़िन्दगी दूभर  लगने लगती है इसीलिये कुछ लोग चलते फिरते उठते बैठते केवल ज़िन्दा लाश की तरह जीते हैं मन का चैन मन की शान्ति कहॉ मिल सकती है उन्हें पता नहीं  इसीलिये बार बार की भटकन से परेशान होकर ख़्वाबों को टूटते देखकर वे टूट कर बिखर जाने पर मजबूर हो जाते हैं मन का चैन उनसे कोसों दूर रहता है इतनी दूर कि लाखों करोड़ों मील दृष्टि दौड़ाने पर भी शान्ति नज़र नहीं आती जिस तरह मंज़िल की खोज में  भटके हुये राही को  दूर दूर तक अपनी मंज़िल नज़र नहीं आती          💔💔🖤💔💔           13/10/77

ज़िन्दगी और मौत(सामाजिक)-82

ज़िन्दगी क्या है किसके लिये जीते हैं सब किसलिये जीते हैं करते हैं सब कुछ आख़िर किसके लिये फिर भी शान्ति नहीं  सभी के जीवन में  व्यर्थ की चिन्ताओं से मुक्त नहीं हो पाते फ़िज़ूल की परेशानियाँ  घर किये रहती हैं क्यूँ मन मस्तिष्क को जकड़े ही रहती हैं कभी कभी तँग आकर कुछ मुक्त होना चाहते हैं चाहते हैं इनके चँगुल से छूट जायें.... साथ ही दुनिया की झँझटों से छूट जायें लेकिन..... चाहते हुये भी मुक्त नहीं हो पाते मौत को आख़िर  गले नहीं लगा पाते क्या सचमुच  मौत भी  इतनी जटिल होती है जितनी पार करना ये ज़िन्दगी होती है 💔💔🖤💔💔   24/9/77

कभी कभी(व्यक्तिगत)-83

कभी कभी मन होता है चमकते चॉद की सुनहरी चॉदनी निकालकर और नदी के दो  किनारों को बाँधकर  तुम्हारे पास भेज दूँ और तुम.... चॉद न होते हुये भी चॉदनी में नहाओ कभी कभी मन होता है कि इन ख़ूबसूरत फूलों की  ख़ुशनुमा ख़ुशबू चुरा लूँ और इसे.... हवा में उछालकर तुम्हारे पास भेज दूँ जिससे तुम इन अनगिनत फूलों की महकती ख़ुशबुओं से भर उठो कभी कभी मन होता है किसी तपती दोपहरी से जाकर कहूँ अकेली क्यों जलती हो ? लाओ थोड़ी सी आग मुझे दे दो और फिर उस तपन को दीपक में रखकर  तुम्हारे पास भेज दूँ जिससे तुम मेरे हृदय की उस तपन से जल उठो लेकिन है नहीं संभव चॉदनी समेटना या फूलों की ख़ुशबू चुराना या तपन का मॉगना        मेरे दाता         👣🙏🏻         19/9/76

मिट्टी(सामाजिक)-84

मिलना है मिट्टी में एक दिन सभी को जानते हैं सभी मगर मानते नहीं  दौलत-अपने मँजिल-सपने  काश...? लेकर जा पाते अफ़सोस  छोड़कर ही जाना है तन भी धन भी महल भी अटरिया भी कुछ भी तो इजाज़त नहीं  ले जाने की मन का सँसार ही जा सकता है साथ केवल तभी तो कुछ लोग जो बार-बार स्वप्न में आकर बतलाते हैं कि हम हैं मौजूद  क्यों कि उन के मन के भाव में  जो रह गया किसी भी तरह उससे मिलना ज़रूरी  हो जाता है उनको यही है सूक्ष्म की शक्ति      💔💔🖤💔💔        18/5/18

निगाहें(सामाजिक)-85

मुझे नहीं मालूम लोगों की निगाहें किसे ढूँढती हैं हर पल..... और..... पा लेने पर  टकराकर वापिस आ जाती है अपनी ही जगह पर फिर करती हैं तलाश न जाने.... किसको कहॉ पर आश्चर्य...? आख़िर किसलिये है इतनी कोशिश जब कि उन्हें मालूम है अच्छी तरह कि..... उनकी निगाहें  किसी एक पर कभी ठहरती ही नहीं  फिसलती ही  चली जाती हैं हर बार....., आगे की ओर...?       💔💔🖤💔💔        21/8/76

जीवन(व्यक्तिगत)-86

जीवन में कुछ फूल हैं कुछ कॉटे कुछ लाल हैं कुछ नीले और कुछ रँग बिरंगे तो...,,, कुछ हैं बड़े सजीले कुछ मुस्काये कुछ मुरझाये कुछ रोये कुछ सोये कुछ दिन के उजाले में खोये और कुछ न जाने हाय ......कहॉ गये         💔💔🖤💔💔          18/8/76

तुम्हारी याद(व्यक्तिगत)-87

तुम्हारी याद में  कभी-कभी ऐसा लगता है तुम मेरे पास ही हो मुड़कर देखती हूँ आश्चर्य .....? तुम नहीं हो देती हूँ आवाज़ तुम्हें  लेकिन मेरी आवाज़  हमेशा वीरानों में ही रहकर खो जाती है और..... थकी सी प्रतिध्वनि  हर बार मेरे पास लौटकर आती है मेरी यह इच्छा तुम्हें देखने की कभी पूरी न हो सकेगी क्या मेरी नज़रों को हमेशा होता ही रहेगा भ्रम और हर बार व्यर्थ होता ही जायेगा सिर्फ़ तुम्हें देखने का उपक्रम            👣🙏🏻           15/6/75

वर्तमान(व्यक्तिगत)-88

एक भूली भटकी याद आई बसन्त में फूलों की सुगन्ध आई और बोली आओ पीछे लौट चलो भविष्य के इन्द्र धनुष की आश्व पर आरूढ़ एक सुन्दर स्वप्न आया जैसे तोड़कर सीपी में  दूधिया मोती निकल आया और बोला आगे बढ़ो किन्तु वर्तमान मेरा पहरेदार कड़ककर बोला ख़बरदार  तुम कहीं नहीं जाओगे यहीं सज़ा पाओगे     💔💔🖤💔💔         11/4/75

तुम(व्यक्तिगत)-89

तुम से मिले थे कभी वो दिन तो याद नहीं  लेकिन तुम याद हो मेरे दाता-मेरे प्रीतम अभी भी हज़ारों रँगों में  रँगी हैं कलियाँ  पर तुम्हारी याद के रँगों में  जहॉ उलझ गई हैं ख़ुशियाँ  तुम होते तो देखते तुम्हारे बिना जीना है कितना मुश्किल यहॉ फिर भी हम जी रहे हैं दूसरों की ख़ुशियों का सहारा लेकर वाटिका में कुछ तलाश  कर रहे हैं शायद कोई आ जाये  मेरे दाता-मेरे हमदर्द का  पैग़ाम लेकर....         👣🙏🏻         10/4/75

शब्द(सामाजिक)-90

शब्द जिन्हें ब्रह्म भी कहते हैं निकलते हैं तीर की तरह घुसते हैं दिल में  काश शब्द सिद्ध हो जाते वरदान में  न कोई टूटता न कोई रूठता सबकी झोलियॉ भर जातीं ख़ुशी से  मनोकामनाओ...

दु:ख(सामाजिक)-91

अपना दु:ख अपना ही है अपना सुख अपना ही है यह कोई पानी नहीं  जो बॉटने से बँट जायेगा यह कोई कपड़ा तो नहीं  जो काटने से कट जायेगा जब हम सुख रखते हैं अपने ख़ज़ाने में  और दु:ख बॉटना चाहते हैं जमाने में  क्यों ?   💔💔🖤💔💔

दिल में(आध्यात्मिक)-92 

दिल में बसते आप हैं फिर कैसे नाता तोड़ दें दिल्लगी दिल से लगी  फिर....? दिल को कैसे तोड़ दें दिल में रहकर ही तो आप करते हैं सब काम वो सोच भी ना पाते हैं हम कैसे करते आप वो मौन की भाषा समझते प्यार की परिभाषा भी मन की हर तरंग को कैसे पकड़ते आप भी रोम के हर छिद्र में  वजूद रखते आप ही तू और मैं - मैं और तू सब कुछ हैं बस आप ही                 👣🙏🏻

दो बिन्दु(सामाजिक)-93

मृत्यु ! जीवन की उपलब्धि और जीवन ? मौत का खुला व्दार जीवन और मृत्यु दो विभिन्न बिन्दु हैं मिलती है जिनसे समय की डोर की एक सरल रेखा दो बिन्दुओं के बीच की सबसे कम दूरी फिर भी मनुज मनु का सुपुत्र कितनी बेफ़िक्री से सॉसों के लम्बे डोर को खींचकर  कहता है न व्यग्र हो ज़िन्दगी बहुत लम्बी है          💔💔🖤💔💔

अतीत(आध्यात्मिक)-94

अतीत के झरोखों से झॉकते-झॉकते जब आज को देखा वर्तमान कितना ख़ुशनुमा फूलों की पँखुड़ियों सा बिखरा ख़ुशबू बिखेरता सुखद बेहद दोनों हाथों को फैलाये ऊपर की ओर जैसे कह रहा हो उस परमसत्ता से क्या कुछ नहीं दिया तुमने भरपूर उल्लास के साथ जीया हूँ मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तेरी वजह से मेरे दाता मेरे परवरदिगार         👣🙏🏻

ज़िन्दगी(सामाजिक)-95

ज़िन्दगी एक पगडंडी चलते जाना है न जाने कब तक किस तरह किस जगह टूट जाये ये पगडंडी कहॉ मिल जाये ये ज़िन्दगी  ज़िन्दगी  हो जाये गुम पगडंडी की भॉति टूट जाये और रह जायें याद सिर्फ़ यादें        💔💔🖤💔💔

जग में(आध्यात्मिक)-96

जग में कोई तेरे जैसा  दाता मेरे दिखता ही नहीं  तू ही मेरी नाव को खेता तुझ जैसा मेरा कोई नहीं  सारे रस्ते तेरे दर की  याद मुझे आती ही रही पल-पल सजदे में ये निगाहें  दर तेरे झुकती ही रहीं ख़ामोश से थे वो सारे मँजर  जिनमें कभी ख़ुशियाँ हैं रहीं सहमा-सहमा सा हर बन्दा नज़रें चुराये देखे ही नहीं  ये कैसी ख़ाली सी गठरी जो  अन्तर्तम को भिगोती ही रही  ना जाने तेरी याद के ऑसूँ  मैं कैसे अब तक पीती रही                   👣🙏🏻

तेरी याद(आध्यात्मिक)-97

तेरा याद का प्याला हरदम साथ में अपने मैं रखती हूँ जब-जब याद सताती तेरी घूँट-घूँट भर पीती हूँ तुम क्या जानो विरह की गाथा जन्मों से चलती आई है तभी तो छोड़के हर पारी में  तुमने मुझको विरह दिलाई है तब से आज तक तक भटकती प्यारे इस जीवन भी भटक रही ज्यूँ-ज्यूँ विरह-वेदना बढ़ती त्यों-त्यों टीस उठा करती चौरासी की भटकन प्यारे अब तो दूर कराओ तुम एकाकार करो अब गुरुवर अन्तर्तम में बिठालो तुम               👣🙏🏻