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रिश्तों के ताने-बाने-413

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रिश्तों के ताने-बाने में तू ख़ुद को मत उलझाया कर आया है अकेला-जाना अकेला ख़ुद के लिए तू जीया कर ताने-बाने जितने भी हैं स्वार्थ के धागे बुनते हैं केवल दाता ही तेरे हैं बात वही सब सुनते हैं तूने जिनको चाहा अब तक कुछ भी वो ना लौटा पाये दाता तेरे प्यार के बदले सब कुछ तो तुझे देते आते बस.. शुकराना उनका ही कर बाकी सबके तो कर्ज़ चुका दिल के कोने में उनको बिठा उनकी यादों में खोया कर !!                         @शशिसंजय

क्या याद करूं--412

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क्या याद करूं क्या भूलूं मैं कुछ समझ नहीं मुझको पड़ता बस एक बात जो चलती है दिल पीछे दौड़ चला करता जीवन की अंतिम घड़ियों में क्या खोया है क्या पाया है ये चक्र जो घूमा चारों तरफ तो सोचा सब कुछ खोया है दौड़ा करते कुछ बनने को बन जाने और बनाने को वह सब कुछ पीछे छूट गया अब बैठे घुटने जुड़वाने को है चारों तरफ ही सन्नाटा सब खोया पाया सा लगता है पक्षी जब गूंजा करते हैं संगीत वही मन भाता है उड़ जायेगा मन का पंछी तब और कहीं जा जन्मेगा फिर इसी तरह की व्याकुलता लिए वह बार बार ही जूझेगा !!                         शशिसंजय                          13/5/2020

मदर्स डे--411

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एक कहावत है बहुत पुरानी जो बचपन से सुनता आया हूं जीवित पिता से दंगम- दंगा मरे पिता पहुंचाये गंगा केवल पिता ही क्यूं मां बाप दोनों पर ही चरितार्थ होती है यह कहावत मदर्स डे पर फोटो और कविताओं की धूम मची हुई है फेसबुक वाट्सएप पर जो कभी न याद करते हों आज याद कर लें अमावस्या की तरह.... जिस तरह अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए अमावस्या को खीर का भोग लगाया जाता है कैसी विडम्बना है.... जीते जी तड़पाते रहे अपमान के घूंट पिलाते रहे ग़र जरूरत पड़ी तो शोषण करने से भी नहीं चूके मां बाप के प्रति कर्तव्य भूलकर अधिकार जताते रहे कहां है वो श्रवण कुमार जो मां बाप को कंधों पर बैठाता था आज तो तरसती हैं निगाहें मां बाप की कि कंधा देने वाले हाथ कहां खो गए !!                           @शशिसंजय                               10/5/2020

अमृतवाणी--201

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अमृतवाणी--201 ============ अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग-1)  कर्मफल एक ऐसी सच्चाई है जिसे इच्छा या अनिच्छा से स्वीकार ही करना होगा। यह समूची सृष्टि एक सुनियोजित व्यवस्था की शृंखला में जकड़ी हुई है। क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम कण-कण पर लागू होता है और उसकी परिणति का प्रत्यक्ष दर्शन पग-पग पर होता है। भूतकालीन कृत्यों के आधार पर वर्तमान बनता है और वर्तमान का जैसा भी स्वरूप है, उसी के अनुरूप भविष्य बनता चला जाता है। किशोरावस्था में कमाई हुई विद्या और स्वास्थ्य सम्पदा जवानी में बलिष्ठता एवं सम्पन्नता बनकर सामने आती है। यौवन का सदुपयोग-दुरुपयोग बुढ़ापे के जल्दी या देर से आने, देर तक जीने या जल्द मरने के रूप में परिणत होता है। वृद्धावस्था की मनःस्थिति संस्कार बनकर मरणोत्तर जीवन के साथ जाती और पुनर्जन्म के रूप में अपनी परिणति प्रकट करती है। कुछ कर्म तत्काल फल देते हैं, कुछ की परिणति में विलम्ब लगता है। व्यायामशाला, पाठशाला, उद्योगशाला के साथ सम्बन्ध जोड़ने के सत्परिणाम सर्वविदित हैं, पर वे उसी दिन नहीं मिल जाते, जिस दिन प्रयास आरम्भ किया गया था। कुछ काम अवश्य ऐसे होते हैं,...

अमृतवाणी--200

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हमारी चेतावनी को अनदेखा न करें- अगले दिन बहुत ही उलट-पुलट से भरे हैं। उनमें ऐसी घटनायें घटेंगी ऐसे परिवर्तन होंगे जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगें पर नये संसार की अभिनव रचना के लिए आवश्यक हैं। हमें इस भविष्यता का स्वागत करने के लिए-उसके अनुरूप ढलने के लिए-तैयार होना चाहिये। यह तैयारी जितनी अधिक रहे उतना ही भावी कठिन समय अपने लिये सरल सिद्ध होगा। भावी नर संहार में आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को अधिक पिसना पड़ेगा। क्योंकि महाकाल का कुठाराघात सीधा उन्हीं पर होना है। “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायश्च दुष्कृताम्” की प्रतिज्ञानुसार भगवान को युग-परिवर्तन के अवसर पर दुष्कृतों का ही संहार करना पड़ता है। हमें दुष्ट दुष्कृतियों की मरणासन्न कौरवी सेना में नहीं, धर्म-राज की धर्म संस्थापना सेना में सम्मिलित रहना चाहिये। अपनी स्वार्थपरता, तृष्णा और वासना को तीव्र गति से घटाना चाहिए और उस रीति-नीति को अपनाना चाहिये जो विवेकशील परमार्थी एवं उदारचेता सज्जनों को अपनानी चाहिये। संकीर्णताओं और रूढ़ियों की अन्य कोठरी से हमें बाहर निकलना चाहिए। अगले दिनों विश्व-संस्कृति, विश्व-धर्म, विश्व-भ...

अमृतवाणी--199

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(हमारी सुनिश्चित भविष्यवाणी) भगवान् की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है। इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिये सबसे बड़ी दूरदर्शिता है। अगले दिनों में पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है। धन एवं सम्पत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है। हर व्यक्ति अपनी रोटी मेहनत करके कमायेगा और खायेगा। कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है। अगले दिनों इस तथ्य को अक्षरशः सत्य सिद्ध करेंगे। इसलिये वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह पूर्वक निवेदन है कि वे पूँजी बढ़ाने, बेटे पोतों के लिये जायदादें इकट्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें। राजा और जमींदारों को मिटते हमने अपनी आँखों देख लिया अब इन्हीं आँखों को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए। भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी ...

लहलहाती--410

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लहलहाती--410 =========== लहलहाती हरियाली और झूमकर गीत गाते दरख़्तों ने सही है पीड़ा ख़ुद भी अपनी मां पृथ्वी के साथ केवल वृक्ष वनस्पति ही क्यों ? वह हमारी भी तो मां है तभी तो.... जन्म से लेकर मृत्यु तक हम पृथ्वी मां की.... गोद में ही चिपके रहते हैं और वह प्यारी मां चिरकाल तक अपने प्यार से हमें पालती-पोसती है बड़े ही धैर्य के साथ पर हम अभागी औलादें उसका दिल हमेशा से छलनी करती ही आईं हैं हरियाली को मिटाकर अंधाधुंध बहुमंजिली इमारतें  बनाकर ढेर सारे रसायनों का ज़हर उसके कलेजे में डालकर तभी तो आज उस मां ने हमें फटकार कर.... घर पर बैठने को मजबूर कर दिया है (कोरोनावायरस के चलते लांकडाउन) अपनी संतानों से मिले घावों को भरने के लिए प्रकृति मां भी कभी कभी ऐसे कदम उठाने को.... मजबूर हो ही जाती है सिर्फ़ और सिर्फ़.... अपनी... संतानों को सुधारने के लिए!!                        @शशिसंजय                            22/4/2020

बहुत दिन--409

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बहुत दिन गुजर गए याद अभी भी बाकी है दर पर तेरे जाने का उल्लास अभी भी जारी है मन कहता है तुम आस-पास पर स्थूल का दिखना बाकी है ना साधना है ना तप है कोई तब सूक्ष्म भी दिखना बाकी है कुछ बातें हैं-कुछ यादें हैं कुछ जो तुमने लिख डाला उनको पढ़कर-उनमें खोकर तेरा अक्स ढूंढना जारी है !!                             @शशिसंजय                                 18/4/2020

कोरोना--408

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तुम्हें क्या लगता है क्या है ये कोरोना सभी डरे सहमे हुए हैं और तुम बेफिक्र की तरह ध्यानस्थ हुए बैठे हो शायद इसीलिए कि तुम्हें यह अंदाजा काफ़ी अरसे पहले ही हो चुका था तभी तो तुमने मानव जाति को आगाह भी किया था और न जाने कितनी साधनाएं ख़ुद ने कीं और दूसरों से भी कराईं और आज भी करा ही रहे हो क्योंकि तुम हमेशा कहा करते थे कि जहां से विज्ञान फेल होना शुरू होता है वहीं से आध्यात्म.... अपना काम शुरू कर देता है कोरोना यानी किये गये कर्मों का प्रतिफल भले ही किसी ने भी किया हो भुगतना तो सभी को पड़ता है लेकिन..... मुझे पता है कि तुम पूरी सृष्टि की रक्षा किसी न किसी रूप में अवश्य कर रहे हो इसीलिए तो ध्यान मुद्रा में हो अनवरत मेरे गुरुदेव.... मेरे दाता.......!!                                   @शशिसंजय                                         5/4/2020

श्रीराम--407

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श्रीराम के वंशज हैं हम हम सबके वे भगवान हैं आराध्य भी-गुरु भी वही मां भगवती के साथ हैं आज फ़िर रावण (महामारी) से वे युद्ध का उद्घघोष करते साधना की शक्ति से गुरु विश्व को हैं मुक्त करते जिसके जो आराध्य हैं सब उनसे ही विनती करें प्रभु आज फ़िर से आप इस रावण से सबकी रक्षा करें !!                                   @शशिसंजय

विश्वास की डोर--406

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विश्वास की डोर से बंधे हो तुम तुम्हारे सिवा... भरोसा नहीं है किसी पर मुझको तभी तो याद आता है... तुमसे दूर जाने का वो दिन जब श्रद्धा और विश्वास से बनाई गई फूलों की मालाओं को गले में पहनाने की बजाय तुम्हारे दोनों चरणों में इस तरह बांध दिया मैंने जैसे मां यशोदा अपने लाड़ले को... कहीं भाग जाने के डर से बांध दिया करतीं थीं और तुम.... तुम देखकर मुस्कराये ही जा रहे थे शायद यह सोचकर कि पगला गया हूं मैं.... वो गुलाब के फूल जो कांटों से निकलकर तुम्हारे लिए हार बनकर आये थे उन्हीं गुलाब के कांटों में अपने लिए जगह बना रहा था मैं तुझसे मोहब्बत भला कांटों की सेज से कम तो नहीं तभी तो लोग इस राह पर चलने वालों को पागल करार कर दिया करते हैं !!                             @शशिसंजय                                  19/3/2020

शादी की रस्म--405

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शादी की रस्म अदायगी में कंगना खुलाई की एक रस्म हुआ करती है जिसमें दूल्हा और दुल्हन के हाथों में बंधे धागों की ढेर सारी गांठें एक दूसरे से खुलवाई जाती हैं रस्म का तो पता नहीं कि किसने बनाई होगी लेकिन... इतना तो जरूर तय है कि जीवन में कभी किसी के प्रति मन में दुर्भावनाओं की गांठें लग भी जायें तो.... उन्हें हमेशा खोलते रहना ताकि रिश्तों की मिठास बनी रहे यही प्रेरणा रही होगी इस रस्म के पीछे लेकिन इतना आसान नहीं... मन को खुला रखना... अतीत और वर्तमान की... कढ़वी गांठों की पोटलियों को मजबूत हाथों से खोलना कुछ भी हो... मगर खोलनी तो पड़ेंगी ही  मन की और दिल की गांठें अन्यथा चुभती ही रहेंगी हमेशा ही रिश्तों में पड़ी ये गांठें शायद इसीलिए खुलवाई जाती होंगी दूल्हा दुल्हन से ये मजबूती से बांधी गई ये बहुत सारी गांठें !!                       @शशिसंजय                            18/3/2020

दूर होकर भी--404

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दूर होकर भी हमेशा ही पास होने का एहसास करा जाते हो बिन बोले बिना देखे ही मेरे घावों पै मरहम लगा जाते हो भ्रम की घड़ियों के अधर में सोचता हूं कि तुम नहीं हो मेरे आस पास उसी क्षण अपनी मौजूदगी महसूस करा जाते हो फ़िर भी मैं ढूंढता हूं हमेशा दोस्त और दुनिया में सहारा और एक तुम हो.... जो सदा ही बिना जताये दिये ही चले जाते हो मैं अगर कुछ भी किसी को दे जाता हूं जरुरत के समय तो सुनाता भी बहुत हूं तुम देकर भी हर वक्त मुस्कराये ही चले जाते हो हर छोटे-बड़े गुनाहों को मेरे हमेशा ही माफ़ किया है तुमने कुछ ऐसा ही कर सकूं मैं भी किसी भी तरह.... मुझको भी तो ये हुनर सिखाया होता तुमने !!                  @शशिसंजय                       17/3/2020

मां तुमने--403

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समस्त विश्व की महामारी (कोरोनावायरस) से रक्षार्थ समस्त गायत्री परिवार के परिजनों को गायत्री साधना एवं महामृत्युंजय मंत्र की साधना के निर्देश शांतिकुंज से मिलने पर भावांजलि !! मां तुमने अपने आंचल में पूरे विश्व को ढकना चाहा इसीलिए सबकी रक्षा हित फ़िर से साधन शुरू कराया हम बच्चे तो शरणागत ही हैं शरण में रहते आये हैं लेकिन.... पूरी वसुधा के हित तुमने कितने ही संकल्प कराये हैं जब जब विपदा कहीं भी आई तब तब रोकर तुम्हें पुकारा तुम भी हमेशा दौड़ी आईं सब बच्चों को देने सहारा दुनिया के आंचल से हटकर तेरा आंचल प्यारा है मां इस आंचल से बढ़कर कोई दूजा आंचल नहीं है प्यारा मां तू ही हम सबका सहारा !!                     @शशिसंजय

शक्ति की है--402

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शक्ति की है दुनिया सारी पूरी सृष्टि ही शक्ति है रखना नहीं आया हमको तो डूब गई ये हस्ती है बराबरी का दर्जा पाकर जिम्मेदारी से भटके हैं माया ममता मोह बड़प्पन सबका भान भी भूले हैं धन के लालच की ताक़त ने सब रिश्तों को बर्बाद किया रिश्तों के अपनेपन में भी हमने मर्यादाओं को लांघ दिया सती अनुसूया सीता जैसी प्रतिभाशाली होती थीं नारी सुविधाओं के बलबूते जीतीं अब संघर्ष नहीं कर पातीं नारी बनना होगा एक बार फिर मदालसा जैसी मातायें बना सकें संतानों को फिर से कि भूल सकें ना वो मर्यादाएं                     @शशिसंजय                       13/3/2020

अन्तर का उल्लास--401

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अन्तर का उल्लास यहां पर अन्दर ही सब खुशियां हैं बाहर के आडम्बर से अच्छी अपने भीतर की ये दुनिया है ना कोई रिश्ता ना कोई बन्धन ना ही कोई दुनियादारी है अन्तर में तेरे संग होते ही मिल जाती खुशियां सारी हैं केवल तू ही तू दिखता है चारों तरफ ही ख़ुशबू है तेरी आभा के घेरे में बस तन मन सब भीगा बुद्धू है बुद्धू बनकर रहना आना इसमें ही तो मस्ती है बिन दीखे तू खेल दिखाता कुछ ऐसी तेरी हस्ती है !!                   @शशिसंजय                       10/3/2020

मन की होली--400

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मन की होली खेलूं तुमसे मन को अपना कर डालो रंग बिरंगे फूलों से कुछ इत्र से अब महका डालो तन तो बेसुध पड़ा रहे बस ध्यान में तेरे डूबी रहूं इतना गहरी चली जाऊं मैं दर पर तेरे पड़ी रहूं दुनिया की कुछ ख़बर रहे ना इतना बेख़बरी कर डालो मोह लोभ का रंग चढ़े ना ऐसा मुझ पर रंग डालो तोड़ के सारे मोह के बन्धन अपने बन्धन में कर डालो तेरे सिवा ना कोई जग में पक्का सबक ये रटवा दो खेलूं होली तुमसे केवल हर पल मेरा ऐसा हो रंग बिरंगे रूप तुम्हारे देख के मन खुश होता हो !!                  @शशिसंजय                       10/3/2020

ना कोई चाहत--399

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ना कोई चाहत है ना कोई इच्छा मिलूं तुममें जाकर कुछ ऐसी है स्वेच्छा न संसार मेरा न दुनिया की हूं मैं  तू है मेरे अन्दर और बाहर भी तू है ये विश्वास मेरा प्रबल होता जाये तेरी रूह में मेरा कण कण समाये ऐसे मिलन हो हमारा तुम्हारा चारों ओर तुम ही.. हो ऐसा नज़ारा ढूंढ़े कोई मुझको मैं मिल ही ना पाऊं तन और मन से मैं तुझमें समा जाऊं कुछ ऐसी मेहर मुझ पै कर दो तुम प्यारे कि मुझको दिखें सिर्फ़ तेरे नज़ारे                             @शशिसंजय                                 ,7/3/2020

तुम शायद--398

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तुम शायद बने ही नहीं थे मेरे लिए तुम्हें मेरे गर्भ में सिर्फ़ और सिर्फ़ धरती पर आने के लिए ही जरूरत थी तुम.. बाहर में प्यार खोजते रहे और घर में सभी तुम्हारी चाहत को तरसते रहे तुमने केवल मेरी ही नहीं... बाप भाई सभी की भावनाओं को छला हमेशा ही तुम्हारे साथ पक्षपात हुआ यह कहकर डराते रहे तुम जबकि सच यह है कि तुमने केवल चाहत का दिखावा किया जरूरत पड़ने पर तुम्हारा प्यार तुम्हारी चाहत हमेशा ही गैरों के लिए ही थी ख़ैर..... जो भी हो बहुत अच्छे हो तुम जहां भी रहो हमेशा खुश रहो अपनी ही बनाई दुनिया में यही दुआ है तुम्हारे लिए प्यारे बेटे !!                 @शशिसंजय                     6/3/2020

मेरी दादी--397

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जवानी की जद्दोजहद में जो मां अपने बच्चों को जी भरकर दुलार न सकी क्योंकि बहुत सारी जिम्मेदारियों की चादर जो ओढ़ रखी थी उसने बच्चों की परवरिश और इच्छायें पूरी करते-करते अब थक गई थी वो लेकिन ये क्या.....? फ़िर से एक नया उल्लास फ़िर से बचपन में लौट आने की लालसा फ़िर से उछल-कूद करने का मन जीवन के प्रति अपनापन एक बार फ़िर लौट आया है पता है क्यूं...... क्योंकि.... वो अब दादी बन चुकी है उन मासूम से-प्यारे से बच्चों की दादी जिनकी रगों में कहीं उसका ख़ून भी दौड़ा करता है भरा-पूरा परिवार, पीठ और कन्धों पर झूलते नन्हें परिन्दे जो चारों तरफ से दादी दादी चिल्लाते हुए लिपट जाते हैं उससे और वो कलेजे से लगाकर उन्हें कहीं अतीत में खो जाती है ऐसी है मेरी दादी जब वो ब्याह कर आई थी इस घर में छोटी थी वो दिल से भी और मन से भी लेकिन ससुराल में तो सभी उससे बड़े थे सासू मां दादी मां जिठानियां और सभी लोग दादाजी बाहर चारपाई पर बैठे चौपाल जमाया करते राह आने जाने वालों को बुलाकर चाय पिलाया करते चाय का भगोना हर समय अंगीठी पर चढ़ा रहता इतना सारा काम फ़िर भी सभी को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास प...

फलों से लदे हुए वृक्ष की--396

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फलों से लदे हुए वृक्ष की एक डाली का अचानक से टूट जाना बहुत ही तकलीफ़ देह होता होगा उस वृक्ष के लिए जिसने ताउम्र अपने इस बोझ को रोकर या ख़ुश होकर ढोया था डाली का क्या......? उस पर एक चिड़िया ने आकर बसेरा बना लिया बस फ़िर क्या था......? फलों को लूटकर खाने की डाली को खींचकर ले जाने की होड़ मच गई होगी भीड़ में जिसके हाथ जो लगा उसने उसी को भुनाया लेकिन....... उस दरख़्त के हाथ क्या लगा सोचने की बात है जो सदियों से अब तक उत्तर पाने की प्रतीक्षा में है !!                           @शशिसंजय

सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-15

जब हम महिला जेल में पहुँचे तो सभी बहनों ने तैयारी कर रखी थी, अब उनमें से कुछ बहनों ने भजन सुनाये।बहुत ही भावविभोर होकर गाती थीं।शायद दुख में भगवान के साथ संबंध ज्यादा गहरा हो जाता है।कुछ आगे बैठने को लेकर झगड़ने लगती, तो दूसरी बहनें उन्हें शांत करतीं।बीती बार जिस ख़ूबसूरत प्यारी बच्ची से शीला ने मिलवाया था, कुसमा (परिवर्तित नाम) थी वह।आज बहुत खुश थी वह।अपना मन, अपनी बात कहकर ख़ाली जो कर चुकी थी वो,सब कुछ धीरे-धीरे अच्छा चल रहा था, अब ये सब भी हम सबका इन्तज़ार करने लगीं थीं।हमें भी उनसे मिलने की जल्दी होने लगी थी,इस बार हम उन सभी के लिए प्रसाद के साथ-साथ प्रशासन से अनुमति लेकर गुरुदेव-माताजी की तस्वीरें प्रत्येक बैरक में लगाने के लिए लाये थे। शीला के बच्चे के लिए भी अलग से कुछ खाने का लाये थे। कुछ गुरुदेव की किताबें, आरती, चालीसा आदि, ताकि जो बहनें पढ़ी-लिखी हैं,वे बाद में भी पढ़ सकें। कार्यक्रम के बाद सभी से पूछा कि क्या अब अगली बार हवन करें ?  कुछ तो समझती थीं,लेकिन जो नहीं समझ पाईं उन्होंने भी हामी भर दी ।अब अगली बार हवन के सामान की व्यवस्था करके लानी थी। मंत्र लेखन की कापियां और...

सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-14

महिला जेल में विभिन्न गतिविधियों के चलते भी शीला अपने बच्चे को साथ ही रखती थी,अब उसे हमसे प्यार हो चला था,जेल परिसर में सब्जियां उगाना,निराई-गुड़ाई करना, सिलाई सीखना आदि काफ़ी काम थे, लेकिन फ़िर भी उन्हें हम सभी का इन्तज़ार रहता, अब अमावस्या की जगह एकादशी (ग्यारस) के दिन जाने लगे थे हमलोग, क्यों कि अमावस्या महीने में एक बार ही आती है तथा ग्यारस महीने में दो बार आती है और इस तरह उन बहनों ने माह में दो बार बुलाने की इज़ाजत प्रशासन के द्वारा हमें कहलवाकर दिला दी,जबकि हम लोग माह में एक दिन ही जाना चाहते थे।लेकिन गुरु इच्छा के आगे नतमस्तक थे।शायद उन्हें गुरुदेव की लीला से परिचय ज्यादा पाना था, संगीत और उद्बोधन के माध्यम से गुरुदेव की बात कहकर अन्त में आरती और प्रसाद वितरण जब सबको किया जाता,तभी शीला दौड़ कर जाती और न जाने कहाँ छुपाकर रखी हुई चटनी और आधी रोटी सफ़ेद साड़ी के पल्लू में छुपाकर लेकर आती और कसम खिलाते हुये कहती, दीदीजी, अपने  हाथ से बनाई है आप चखो तो ! सबसे कहती, लेकिन सब ग्यारस का व्रत कहकर मना कर देते, व्रत तो मेरा भी था,किन्तु भावनाओं के सामने मजबूर हो जाती और सोचती कि गुरु...