संदेश

अगस्त, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हो सके तो(सामाजिक)-21

हो सके तो ज़िन्दगी आसान रहनी चाहिए मन कुटिल और दिल कृपण ऐसा न होना चाहिए कौन जाने कब तलक माला मिली है श्वॉस की कौन जाने कब तलक है ज़िन्दगी की आस भी कर चलो ऐसा करम जो याद आना चाह...

मौत(निज भाव)-22

मौत तू किसी का इन्तज़ार क्यों नहीं करती आया जब भी मन में साथ लेकर--चलने का किसी को  ? तो---पूछा भी नहीं----सोचा भी नहीं  ? बस लिया साथ उसको और---आगे चल दी ये कैसा ले जाना है कुछ तो समय दिय...

कलयुग(सामाजिक)-23

आज कलयुग का प्रभाव बड़ों पर ही नहीं बच्चों(मेरे युवाओं)पर भी दिखाई देने लगा है ना जाने क्यों भावनाओं का अभाव रिश्तों का अभाव संबोधन का अभाव न उम्र का लिहाज न मर्यादा की लाज ...

अहंकार(निज भाव)-24

अंहकार चींटी से भी छोटा वैसे बहुत महान,बहुत बड़ा ले डूबता है जीवन को शालीनता-नम्रता से बहुत दूर एहसास भी नहीं होने देता ख़ुद को कि---- मैं घुस चुका हूँ भीतर तुम्हारी निश्छलता, ...

वासना(आध्यात्मिक)-25

वासनाओं का जाल कब से बिछा है पता नहीं चौरासी लाख़ योनियों का सुना तो है मग़र एहसास नहीं फिर भी ना जाने क्यों कुण्डलिनी की जगह वासनाओं का सर्प जड़ जमाये बैठा है सॉप की तरह फु...

खोज(आध्यात्मिक)-26

खोजता हूँ किसको नहीं मालूम मुझे तुम जो चले गये छोड़कर मुझको शायद वही टीस बाकी है मुझमें कहते हैं कि तुम शरीर नहीं--- चेतना हो---- उस चेतना को समझूँ उसी को महसूस करूँ लेकिन--- रूबरू ...

तृष्णा(आध्यात्मिक)-27

तृष्णा का भंडार खाली ही नहीं होता चाहता तो बहुत हूँ कि----- कैसे भी बुझ जाये ये प्यास न जाने जन्म-जन्मान्तरों से आ रही है मेरे साथ तभी तो कितना भी प्रयास करूँ इस आग को बुझाने का क...

पन्द्रह अगस्त-2018(देश प्रेम)-28

आज पन्द्रह अगस्त को  आज़ादी की ख़ुशियाँ मना रहा है पूरा देश लेकिन समझ नहीं आता मुझको देश आज़ाद हुआ कि नहीं.....? हम ख़ुद ज़रूर आज़ाद हो गये भ्रष्टाचार करने के लिये... दहेज की लालसा में...? बहुओं को मार देने के लिये... कन्या भ्रूण हत्या के लिये... बहन-बेटियों,यहॉ तक कि.... मॉओं की इज़्ज़त लूटने के लिये.... मानसिक विकलांगता आ गई है हममें क्यों कि...? दूसरों के अधीन रहने के... आदी हो गये थे हम इसीलिये...? शायद हम आज़ादी का मतलब समझ नहीं पाये काश.... हम समझ पाते आज़ादी का अर्थ  --अच्छे संस्कारों का अर्थ --देश की मानसिक,आर्थिक,शारीरिक उन्नति का              अर्थ --ईमानदारी से जीने का अर्थ --नारी जाति के सम्मान का अर्थ और भी बहुत कुछ जो समझ से बाहर रह गया हो                         जयहिन्द 

ख़ुशनुमा(आध्यात्मिक)-29

ख़ुशनुमा वो पल जो तिरे साथ गुज़रे हैं नहीं भूल सकता तिरा मुस्कुराते हुये दिलासा देना मैं हूँ न..... क्यों घबराते हो सब ठीक हो जायेगा  कभी-कभी... बहुत याद आता है वो नूर.... जो छाया था चारों तरफ़ तिरे जिसके घेरे में बैठते ही समाधान हो जाता था मन में चल रही हर एक ऊहा-पोह का... याद आते हो तुम बहुत ही मेरे दाता-मेरे प्रीतम           👣🙏🏻

जैसे भी(आध्यात्मिक)-30

जैसे भी मैं रहता हूँ अपनी दुनिया में जीता हूँ ख़िदमत उसकी ही करता हूँ और उसी के ख़्वाब में रहता हूँ दुनिया रूठे या छूटे मुझसे परवाह नहीं मैं करता हूँ हो यारे ख़ुदा जिसका अपना मैं उसी सहारे जीता हूँ कोई काम मेरे आयेगा क्या...? उम्मीद ख़ुदा से करता हूँ जब चाहेगा वो भेजेगा कोई देवदूत मुझको अपना बस वही सहारा देगा मुझे जो है मेरा सच्चा अपना               👣🙏🏻

तस्वीर(आध्यात्मिक)-31

देखकर तुम्हारी तस्वीर को कुछ गुनगुनाने लग जाती हूँ मैं कुछ यूँ एहसास होने लगता है कि सुन रहे हो तुम मुझे सचमुच ही सुनते हो तुम क्यूँ कि... रहते हो इर्द-गिर्द इर्द-गिर्द ही क्यों....? अन्तर्तम में बैठकर देते हो प्रेरणा कुछ सुनने और सुनाने की आती हैं यादें  बैठकर चरणों में गीत कुछ सुनाने की शायद..... इसीलिये गुनगुनाती हूँ मैं मेरे प्यारे दाता                👣🙏🏻

सोचता हू(आध्यात्मिक)-32

सोचता हूँ न जाने लगातार कब से ये ज़िन्दगी...? न जाने किन-किन रूपों में जन्म-जन्मान्तरों से  चलती चली जा रही है और हम सभी चलते चले जा रहे हैं उसी के पीछे-उसी के अधीन पिछला पता नहीं लेकिन...! इस जीवन की सार्थकता क्या है ? लक्ष्य क्या है...? सब कुछ सँसारी व परिवारी जनों  के लिये करना व जीना या फिर अपने उद्धार की कोशिश करना ईश्वर पर विश्वास और ईश्वर के सानिध्य के लिये जीना क्यों कि..... सब यहीं छूट जाना है साथ तो केवल उसी को जाना है  मेरे ईश्वर......मेरे गुरु....मेरे प्रीतम                👣🙏🏻

बरसात(आध्यात्मिक)-33

बाहर तेज़ बरसात की आवाज़  भीतर तेरी रहमतों की बरसात कितना अन्तर है दोनों मे आनन्द दोनों ही देते हैं लेकिन.... एक का आनन्द  तन और मन से सम्बन्धित है जबकि... दूसरा आनन्द... तर-बतर कर देता है  आत्मा को... अपनी रहमतों की बरसात से  आनन्द... आनन्द... असीम आनन्द...!!

अनकही(सामाजिक)-34

कुछ अनकही सी बातें  कुछ अनकही सी यादें  कुछ अनकहे से सपने कुछ अनकहे से अपने कुछ अनकहे से रिश्ते कुछ अनसुने शगूफ़े  क्या कुछ नहीं है दुनिया में फिर भी.... बदस्तूर चलना जारी है रुकता नहीं है कुछ भी सब कुछ..... यथावत चलता रहता है बेशक... बहुत कुछ... अनकहा सा.. रह गया हो...       💔💔🖤💔💔

सुबह-सुबह(पारिवारिक)-35

अलभोर-सुबह वो आकर जब रोज़  जगाती है मुझको तो ग़ुस्सा आता है बिना नागा किये चली आती है कभी तो ना आने की ना जगाने की सोच...? लेकिन वह है कि  मानती ही नहीं झुँझलाकर जब भी कभी ग़ुस्से से बाहर आती हूँ डाँटने उसको तो फुर्र से उड़ जाती है मेरी प्यारी गौरैया शायद...... पिछले जन्म में मेरी.... कुछ रही होगी मेरी नज़दीकी  चिड़िया रानी

व्यवस्था(व्यक्तिगत)36

व्यवस्था समाज की व्यवस्था परिवार की व्यवस्था ख़ुद की शिकायतें करते हैं सभी लेकिन.... सोचता नहीं कोई कि हम भी शामिल हैं इस व्यवस्था में कहीं न कहीं.... थोड़ा बहुत... हमारी ज़िम्मेदारी भी रही होगी इसे बनाने ..... और बिगाड़ने में..... अब भी कुछ नहीं बिगड़ा ख़ुद से शुरु करें सँभलना  धीरे-धीरे सब कुछ.. बदलता जायेगा क्यों कि..... यह व्यवस्था भी तो हम ही हैं  केवल हम.... कोई दूसरा नहीं.....           💔💔🖤💔💔

झुन्ड(सामाजिक)-37

कच्ची बस्ती  और पास ही के गॉव के छोटे बच्चों का अधनंगा झुंड बरसात में भीगते हुये जब छपाक-छपाक खेलता है तो देखती हूँ अमीरों व मध्यम श्रेणी के बालकों की ओर जिनके मॉ-बाप  मिट्टी से दूर-पानी से दूर हर चीज़ से दूर रहने की सलाह देते हैं क्यों कि.... उन्हें डर है.. संक्रमण हो जाने का....? हर बात पर संक्रमण हर जात से संक्रमण फिर भी उनके बच्चे कहीं अधिक बीमार रहते हैं इन बच्चों की तुलना में आख़िर क्यों.......?            💔💔🖤💔💔