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जुलाई, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

परिवर्तन(व्यक्तिगत)-38

परिवर्तन जीवन और प्रकृति का नियम है ज़िन्दगी की दौड़-धूप के बाद अब आराम में आ गया हूँ मैं  परिवार के साथ समय बिताना अच्छा लगता है.......! घर-परिवार.... घर यानी ख़ूनी रिश्ते परिवार यानी सब(इंसान,पशु,पक्षी,जीव,जन्तु) सभी मेरे अपने ख़ुशी का पर्याय हैं सभी तो अपने हैं न जाने पिछले कितने जन्मों में बार-बार मिलते रहे होंगे तभी तो वर्तमान जीवन में भी सभी लोग मिलते और बिछुड़ते रहते हैं सृष्टि का यही नियम है परिवर्तन......! परिवर्तन........! और परिवर्तन........!            💔💔🖤💔💔

बेपनाह(व्यक्तिगत)-39

बेपनाह  मोहब्बत है तुमसे पता नहीं क्यूँ  शायद इसलिये कि नज़दीक में काफ़ी अरसे से तुम्हारा अभाव था घर के तूफ़ानी लड़कों के बीच रहते-रहते और जीवन के संघर्षों के चलते मैं भी मन से... न जाने कब कुछ कठोर बन बैठी तुम्हारे आने से,फिर वही मासूमियत  शरारतें,बचपन की उछल कूद सब कुछ वापस लौट आया है तुम चिराग़ हो इस घर का दिल का टुकड़ा हो हम सबका तुम्हारी शरारतों में हम सबकी शरारतें छिपी हैं.... प्यारी बच्ची एैज़िल 

ऑखिन देखी(सामाजिक)-40

 मेरे ही एक मित्र जो दिन भर व्यस्त रहते थे सबका हाल-चाल जानने में उनकी अपनी एक अलग ही दुनिया थी फोन की  व्यस्त से व्यस्ततम अचानक फोन आना बंद मैसेज आना बंद काफ़ी दिनों के बाद पता चला कि वे अब....... दुनिया छोड़ चुके हैं अन्दर तक हिला दिया उनके व्यक्तित्व ने इतने मिलनसार लेकिन..... अब परिवार को पूछने वाला कोई नहीं कहॉ गये वे सभी चाहने वाले..... एक बार तो पूँछ लेते कि.... अब मैसेज और फोन नहीं आ रहे..... दोस्त कहॉ हो..... कहॉ हो तुम.... कैसे हो.... तुम्हारे परिवार को कुछ.... सहायता.... भाव संवेदनायें... अपनापन चाहिये क्या......?              💔💔🖤💔💔

गुरुपूर्णिमा(आध्यात्मिक)-41

गुरु की गाथा क्या कहूँ सब कुछ उनकी देन रहमत उनकी देखकर बरसत हैं ये नैन मन जब भी विचलित हुआ तुरत संभाला आय हर पल किसी भी रूप में करते रहे सहाय मन और वाणी करम से बन न सके उन जैस फिर भी वो अपनाय रहे हम जैसे थे तैस          👣🙏🏻

भीड़(आध्यात्मिक)-42

जमाने भर की भीड़ छाई है चारों तरफ़  इर्द-गिर्द फ़ेसबुक-वाट्सएप आदि-आदि कभी सोचता हूँ कितने अपने हैं इनमें से कितने सच्चे हैं ? इनमें... कुछ तो टाइम पास करने के लिये कुछ मस्ती के लिये कुछ ज्ञान बॉटने के लिये कुछ बतियाने के लिये कहॉ से कहॉ तक जुड़ते जाते हैं पता भी नहीं कौन कहॉ रहता है ये सब जानते बूझते भी दिन चला जाता है फोन पर हालाँकि व्यवस्था अच्छी है नेटवर्किंग की..... फिर भी कभी-कभी ये ख़याल आता है कि... यदि ये नेटवर्क  उससे जुड़ जाता हमेशा के लिये जिसने ज़िन्दगी दी है दुनिया दिखाई है और तो और ? सबसे पहचान कराई है....? कितना ही ख़ुशनुमा होता वो पल.....!            💔💔🖤💔💔

भावना(सामाजिक)-43

भावना बहती नहीं है अब कहीं संसार में देखो कितना आ गया सब फेर इस बाज़ार में भाव के सागर कहीं अब.... सूख से गये हैं सारे भाव के बिन.... तड़पते हैं संसार के सब व्यक्ति सारे अन्तर को जो छू सके कुछ ऐसा भाव चाहिये  आपसी विश्वास हो बस ऐसा भान चाहिये तम का अँधेरा दूर हो ऐसा उजाला चाहिये आपस में प्यार हो संसार ऐसा चाहिये         💔💔🖤💔💔

फ़ितरत(सामाजिक)-44

पहचान प्रतिष्ठा पद सम्मान क्या कुछ.... नहीं पाना चाहते सभी लोग जबकि.... जानते हुये भी कि थोड़े समय का खेल है ये सब कुछ भी साथ नहीं गया आज तक और तो और काया भी यहीं छोड़कर जानी पड़ती है जान-पहचान वाले यहॉ तक कि रिश्तेदार भी जीते जी भूल जाते हैं अगर आप काम के नहीं क्यों कि..... ये फ़ितरत है दुनिया की ये फ़ितरत है समाज की इसे तुम बदल नहीं सकते कोई बदल भी नहीं सका है फिर..... क्यों भागते हैं इस सबके पीछे आख़िर क्यों ?           💔💔🖤💔💔

बाग़-बग़ीचे(आध्यात्मिक)-45

बाग़ बग़ीचे हरियाली में क्या ही मन रम जाता है कल-कल करते झरने बहते मन बच्चा बन जाता है ऊँची-ऊँची चोटी पर जाना मस्त पहाड़ों पर चढ़ जाना कहॉ-कहॉ तुम बैठे जाकर देखके सब ये दंग रह जाना जगह-जगह के दृश्य दिखाकर  मन को कितना भरमाते हो कुछ पल को तो भूल ही जाती तुम तो दिल में बिराजे हो मेरे दाता कृपा तुम्हारी पल-पल बरसा करती है मैं तो ऑंख मूँदकर बैठी चँचलता ही भटका करती है                  👣🙏🏻

अतिथि(सामाजिक)-46

कल अचानक काफ़ी लम्बे अरसे के बाद फोन की घन्टी बज उठी एक ऐसे अतिथि के आने की सूचना थी....जो शायद बरसों पहले विदेश में जाकर बस चुके थे कुछ घन्टों के लिये मेहमाननवाज़ी हुई और वापिस अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान वर्षों पूर्व एक खिलखिलाता हँसमुख व्यवहार लिये चेहरा....... आज कुछ गंभीर...न जाने किधर सोच में डूबा हुआ दिख रहा था पीढ़िया-पीढ़ियों से दूर होती जा रहीं हैं भावी पीढ़ी का रुझान भारत में न होकर विदेशों की ओर है क्यों कि.... वे जन्मे वहीं पर हैं,पढ़ते भी वहीं पर हैं किसी भी कारणवश इधर आये भी नहीं एक-दूसरे को पहचानते भी नहीं आख़िर क्यों...... दोष उस नाज़ुक पीढ़ी का नहीं न जाने किन हालात-किस चाहत के चलते बाहर जाकर बस गये मॉ-बाप ऐसा कब होगा...,, जब योग्यता की परख हमारे देश में ही होने लगेगी समस्त सुविधायें जो बाहर जाने पर मिलती हैं अपने देश में ही मिलने लगेंगीं ताकि कोई भी भारत माता का लाल पैसे के लिये अपना वतन छोड़कर ना जाना चाहे...,                    💔💔🖤💔💔

कुछ तो बोलो(आध्यात्मिक)47

कुछ तो बोलो कुछ तो बताओ अब फिर.... कब आओगे  आधी-अधूरी ख़्वाहिश मेरी पूरी कब कर जाओगे  साथ तुम्हारा भाता मुझको मौसम भी है मिलने का पल न ठहर कर घन्टों रहना रोम-रोम खिल जाये मेरा आना तुम्हारा-ख़ुशबू तुम्हारी सब कुछ मन को भाती है शब्द नहीं कुछ भी कहने को बस संग ही तेरा काफ़ी है               👣🙏🏻

सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा(आध्यात्मिक)-48 

ये छतरियॉ छतरियॉ नहीं जीवन्त तुम्हारे प्राण हैं सिर झुकाते ही वहॉ पर मुझको..... थाम लेते तुम्हारे हाथ हैं प्यार की छुअन होते ही बह निकलते अश्क़ हैं लाड़ कितना है तुम्हारा  ये पूछ लो उससे.... जो बहती अश्रुधार है प्यार की चादर से जैसे ढक दिया तुमने मुझे कैसे कहूँ अनाथ हूँ मैं  मॉ-बाप मेरे आप हैं आप ही सब कुछ हैं मेरे क्या कहूँ मैं आपसे आप से तुम तुम से तू के सारे रिश्ते आप हैं यार भी तुम  प्यार भी तुम और भी संबंध जो... दुनिया मे होते हों सभी..... वो भी संबंध मेरे आप हैं बस आप हैं               "मेरे दाता"

बारिश(आध्यात्मिक)-49

बारिश में भीगते पहुँच गये तेरे दर पर देखा....तो लगा कि जैसे....., तुम इन्तज़ार में ही थे देखकर तुमको... तबियत कुछ अच्छी सी होने लगी शायद..... कुछ ताक़त तुम बिन देखे ही दे रहे थे मन में तरंगें अचानक उठने लगीं मेरे दाता.... मेरे प्रीतम..... कैसे करूँ शुकराना  जो तुम लगातार दिये चले जा रहे हो एक ताक़त - एक हौसला-एक जज़्बा  कुछ कर गुज़रने का एक असीम आनन्द के साथ एक नई दुनिया को छूने का शुक्रिया.... हर पल.... आपका..... मेरे प्रीतम-मेरेदाता-मेरे गुरुवर                    👣🙏🏻

ऑधियॉ(आध्यात्मिक)-51

ऑधियॉ अब चल पड़ी मौसमे बहार की कौन जाने अब किधर से तेज़ आयेगी हवा भी थम जायेगा ये तूफ़ान  थम जायेंगी ऑधियॉ मन में जो तूफ़ान उठा है हर पल तेरी चाहत का चरणों में सजदा करने का तेरे चरण दबाने का शिद्दत से इक हूक उठी थी केवल तुझको पाने की इस जीवन में पूरी होगी अभिलाषा ये छोटी सी नहीं पता..... ये सब कुछ मुझको ये सब तो तुम ही जानते हो कुछ तो बोलो प्यारे दाता केवल.... तुम ही मुझको जानते हो तुम ही सब पहचानते हो कुछ तो बोलो..,,, कुछ तो बताओ..., दाता मेरे प्यारे गुरुवर.,.,,           👣🙏🏻

धर्म(सामाजिक)-53

धर्म की छॉव में बैठकर मतलब की धूप सेंकना इन्सान की आदत ही बन गई है न जीवन में फ़र्क़  न आचरण में बदलाव भीतर में झूठ और फ़रेब  बाहर से मृदुल वाणी आचरण में दिखावा क्या यही है धर्म...,? क्या यही है धारणा...,? क्या यही है समाधि..,,? ये सब बहुत गूढ़ हैं लेकिन... लोग ये ढोंग और पाखण्ड का चोगा  तन और मन में क्यों पहनते हैं पता नहीं......,?                💔💔🖤💔💔

लहर(आध्यात्मिक)-52

लहर दीवानी उठ रही कैसे रोकूँ मैं इसको ना डुबा दे कश्ती को कैसे सँभालूँ मैं इसको कैसे बॉधू शब्दों में  याद वो तेरी रहमत की उठ रहा तूफ़ान दिल में और यादों की बारात भी शब्दों में कैसे बयॉ करूँ हर पल कैसे साझा करूँ पल पल तेरी याद के मोती माला में कैसे गूँथा करूँ तेरे साथ का हर क्षण मेरा क्या भूलूँ क्या याद करूँ               मेरे दाता....मेरे गुरुवर                  👣🙏🏻       

किलकारी(व्यक्तिगत)-54

किलकारी जब गूँजती है घरों के ऑगन में  याद आ जाता है वो बचपन खेला करते थे बगिया में  आज नहीं वो बाग़ बग़ीचे  और नहीं वो नीम का पेड़ जिससे घन्टों बतियाते थे कहते थे सब मन का भेद अँगना भी अब कहॉ बचा है बच्चे घर में हो गये क़ैद  अब तो टी वी मोबाइल से खेला करते घर में ही बैठ देख के इन भोले बच्चों को लगता बचपन बरबाद हुआ काश....., फिर से वो झूले वो बगिया वो खुला हुआ अँगना और वही बतियाने वाला नीम का पेड़ इन बच्चों को भी मिल पाता                  💔💔🖤💔💔

सम्बोधन(व्यक्तिगत)-56

तुम बड़े प्यार से  बड़े अपनेपन से पुकारते हो मुझे..... कभी पण्डित-कभी लड़का जीजी  शायद इसीलिये कि प्रतिरोध तुम कर नहीं सकते व्यवस्था के प्रति परिवार और समाज ने लड़की होने की बँदिशों में बॉध रखा है तुम्हें  जब तुम्हारे लिये लड़ता है ये शरीर,ये वाणी,ये मन तो तुम ख़ुश होकर पुकारते हो इन नामों से...... तुम्हारे द्वारा दिया गया ये सम्बोधन कुछ अलग सा हौसला भर देता है मुझमें ......? काश.....ये हौसला, कुरीतियों से बग़ावत का, और निडर सी साफ़गोई.....! तुम सभी में भर जाये तुम सभी की आत्मा भी (जो न लड़का है न लड़की) पुकार उठे ? कि हम लड़कियॉ भी....? बग़ावत का बिगुल बजा सकती हैं तुम्हारी....  रूढ़िवादी व्यवस्थाओं के प्रति....? ख़ामोश .....!                💔💔🖤💔💔                       2/11/76

दूर(आध्यात्मिक)-55

दूर क्षितिज से आते दिखते ब्रह्मरन्ध्र में जाते दिखते अन्तर में जाते ही मुझको कितने ही तुम नाच-नचाते कभी रुलाते कभी हँसाते जाने क्या-क्या दृश्य दिखाते घन्टों साथ बिताकर संग में  फिर से क्यूँ ग़ायब हो जाते a मुझको कितना अच्छा लगता संग में जब तुम मेरे होते छोड़ के जब तुम मुझको जाते दिल के कितने टुकड़े हो जाते             👣🙏🏻

भय(व्यक्तिगत)-57

जब भी कभी मन में कोई भय  बचपन में दिल में बैठ जाता है बड़े होने तक भी निकल नहीं पाता आख़िर क्यों.....! इसलिये कि उसे निकालने का प्रयास नहीं किया गया या इसलिये कि..... कभी ज़रूरत ही नहीं समझी गई या फिर...,, कहीं वह गहरे में दबा हुआ था जो भी हो.....? इसे निकालना ही होगा किसी भी तरह..... किसी भी प्रयास से हमेशा के लिये.....       💔💔🖤💔💔              30/10/76

वँश(आध्यात्मिक)-58

वँश परम्परा चलती रहे मेरे गुरुवर मेरे दाता की तेरे दर पै आना बना रहे सिर झुकते रहें मेरे साक़ी  तुम खुदा के भेजे बन्दे हो तुम किसी खुदा से कम भी नहीं जो मॉगा है तेरे दर पर कोई ख़ाली हाथ गया ही नहीं तुम देते हो दिखता भी नहीं हम देते और दिखलाते हैं ये फ़र्क़ है तुझमें और मुझमें  तुझ सी मेरी औक़ात नहीं               👣🙏🏻

बेमन(व्यक्तिगत)-59

मैं हर वर्ष बेमन से दिवाली मनाता हूँ परम्परा से जुड़कर संस्कारों से लिपट कर लेकिन यह मेरी दीवाली नहीं है मैं तब हर रोज़ दिवाली मनाऊँगा जब हम सबमें  मानवता का बोध हो जायेगा वह मेरी दिवाली होगी मेरी अपनी दिवाली ऐसी दिवाली जैसी किसी ने मनाई नहीं जैसी कोई मना नहीं सकता जैसी कोई मना नहीं पायेगा मेरी दिवाली मेरे अपने ढँग की दिवाली लेकिन..... कब...... आख़िर कब.....        💔💔🖤💔💔         20/9/75

तुमको(आध्यात्मिक)-60

तुमको जानूँ तुमको ही मानूँ बस इतनी मुझ पै दया करना तुम पर ही हो विश्वास अटल शक्ति भर इतनी दे देना मन-वचन-कर्म अरु छाया से सत्कर्म बनें-करुणा बिखरे ऐसे गुण भरना अन्तर में  तेरी ही प्रतिध्वनि निकले तुम प्राण पियारे हो मेरे बस ध्यान तुम्हारा बना रहे नख से सिर तक में तेरी छवि मेरे अन्तर में दिखती ही रहे               👣🙏🏻

बचपन(व्यक्तिगत)-61

बचपन में मुझसे मेरे ही खिलौने का एक हाथ टूट गया उस हाथ को जोड़ने की प्रक्रिया में  मुझसे पूरा खिलौना ही टूट गया तब मैं.... बहुत रोया,चिल्लाया हर चीज़ का मैंने प्रतिकार किया बचपन के उस अवचेतन मन में  कहीं एक कोने में  वह बात अटक गई अब जब भी कभी स्मरण आ जाता है,तो पूछता हूँ अपने मन से अब कितना रोऊँ, चिल्लाऊँ ? किसका प्रतिकार करूँ क्यों कि....., अब किसी को भी जोड़ने की प्रक्रिया में  मैं स्वयं टूट रहा हूँ                 💔💔🖤💔💔                       19/1/75

रेत(आध्यात्मिक)-62

रेत फिसलती है जैसे  ये वक़्त फिसलता जाता है मन नहीं समझता इस सबको वो मस्त हुये ही जाता है तन भी धीरे-धीरे ढलता मन फिर भी समझ न पाता है सब मन के मारे दुनियाँ में  ये मन तो कुँलाचें भरता है दाता मेरे मन को तुम पकड़ो मेरे वश की तो बात नहीं मन रहे तुम्हारी मुट्ठी में  दे दो इत्ती सौग़ात यही           👣🙏🏻

तानाशाह(सामाजिक)-63

कुछ लोग जिन्हें अपने "कुछ"होने का भ्रम हो जाता है और जब वे संयोग से सफलता की एक-दो सीढ़ियाँ चढ़ जाते हैं तब वे चाहते हैं कि...... दुनियाँ उन्हीं के अनुसार चले उन्हीं के सिद्धान्तों को स्वीकार करे उन्हीं की विचारधारा में विश्वास प्रकट करे और उनकी हर गतिविधि का अन्धानुगमन करे यहॉ मनोविज्ञान गवाह है कि..... कुछ लोग तानाशाह प्रवृति के होते हैं दुनिया को अपने अनुकूल न बना पाने पर टूट-टूटकर बिखर-बिखर जाते हैं और स्वयं अपने जीवन को तानाशाही बनाकर मन को सान्त्वना देने का प्रयास करते हैं           💔💔🖤💔💔                 15/1/75

बैठकर(आध्यात्मिक)-64

बैठकर चरणों में तेरे क्या कुछ नहीं पाया मैंने लेकिन तेरी याद सताती कैसे समझाऊँ तुझको मेरे दाता फिर से मुझको अपने पास बिठाओ तुम केवल अपनी प्यारी चितवन एक बार फिर डालो तुम कैसे शक्तिपात कर देते फिर से वही नज़ारा दो सिर पर रख कर हाथ मेरे तुम जन्नत फिर से दिखला दो              👣🙏🏻

जंग(सामाजिक)-65

जंग है ग़र ज़िन्दगी तो जीत होनी चाहिये क़द्दावर हैं आप ये पहचान होनी चाहिये बुज़दिली ख़ुशामदी को दूर भगाना चाहिये जज़्बा है दिल में प्यार का महसूस होना चाहिये  साथ ले जाना पड़े तो व्यवहार लेकर जाइये दाता के दिल में ख़ास अपनी जगह बनाते जाइये सामान कुछ जाता नहीं तन भी तो रखकर जाइये लेकर जो जा सकते हैं अच्छे कर्म लेते जाइये                      💔💔🖤💔💔