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दिले शायरी -17

तुम मिले तो कुछ ऐसी बात हो गई कुछ भी नहीं था मेरे पास मग़र जिन्दगी से मुलाकात हो गई!! बड़े नादान हैं वो लोग जो इस दौर में भी वफ़ा की उम्मीद करते हैं यहाँ तो दुआ कबूल न होने पर लोग ...

मां की यादें 430

​ इक नन्हा सा साया था, जाने कब... मेरे साए से भी बड़ा हो गया। कल ही की तो बात लगती है, इन हथेलियों में सिमट जाने वाला, आज सबकी फिक्र ओढ़े, खुद से ही बेपरवाह हो गया। वो छत की मुंडेर पर... खामोशी से घंटों अकेले खेलना, बचपन में भी जैसे, वो कोई गहरी सी उम्र जी रहा था। बगैर किसी शिकायत, बगैर किसी आस के, सबके हिस्से की धूप, चुपचाप पी रहा था। मुझे समझ ही नहीं आया... कब मेरा वो अल्हड़ सा बच्चा, इतनी खामोशी से समझदार हो गया। सबकी उंगलियां थाम कर रास्ते दिखाते-दिखाते, इस माँ के अंधेरों का, इकलौता मदार हो गया। पैंतीस बरस... उम्र की शाख से पैंतीस मौसम यूं गिरे, कि पता ही न चला। कब उसने घर की तमाम ज़िम्मेदारियां, किसी पुरानी सर्द शॉल की तरह, अपने कंधों पर डाल लीं। मेरी इस छोटी सी बगिया की, सारी पतझड़ उसने खुद सम्हाल ली। आज सोचती हूँ, क्या दुआ दूँ उसे? मेरी दुआओं के लफ्ज़ भी, उसके कद से अब छोटे लगते हैं... बस एक ही गुज़ारिश है, उस आसमान वाले से, मेरी उम्र की डायरी में, जितने भी पन्ने बचे हैं अब... वो सारे के सारे, मेरे नाम से काटकर, चुपके से... उसकी उम्र में जोड़ दे।     ...

कुछ यूं है तेर शुकराना-429

कुछ यूं है तेरा शुकराना... ऐ मेरे रहबर, जैसे तपती दोपहर में, किसी ने छांव की चादर ओढ़ा दी हो और रूह को... बाहों में समेट लिया हो! वो जो एक प्याली थमाई थी ना तूने? मैं घूंट-घूंट पीता रहा... हैरत ये थी कि प्याली खाली तो होती थी, पर सूखती नहीं थी कभी! मैं देखता रहा... और तू ना जाने कहाँ से, बिना नज़र आए, चुपके-चुपके उसे लबालब भरता गया। जब-जब लगा कि अब सब रीता हो जाएगा, खर्च हो जाऊंगा मैं... तब-तब, बिना कोई आहट किए, तूने मेरी हैसियत से कहीं ज्यादा, मेरी हथेलियों पर रख दिया। क्या कहूँ... बस शुकराना है तेरा! वो जो इश्क और इनायत का घूंट पिलाया है ना तूने, उसी ने... मुझे कतरा-कतरा, तेरा कर दिया है !!                        🙏🙏

याद आपकी-428

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याद आपकी- बात आपकी  मुझको खूब सताती है रोकर हंसना- हंसकर रोना कुछ ऐसा हाल बनाती है तुम तो मुझको देखा करते मैं तो देख नहीं पाती किससे भेजूं- कहां मैं भेजूं तेरे लिए जो लिखी है पाती मेरे दाता समझो अब तो हुआ ये क्या है.. दिल का हाल मन को मेरे- "मनहर" मेरे फिर से कर दो मालामाल !!

कर्म -426

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कर्मों का लेखा-जोखा लेने सब आपस में मिलते हैं मात-पिता और बच्चे सारे कर्मों से ही सबको चुनते हैं हम कहते सब मेरा - मेरा कोई यहां ना मेरा होता जिसका क़र्ज़ है चुकना बाकी वो ही केवल साथ है होता रिश्ते - नाते प्यार के धागे पिछले कर्मों से आये हैं किसी से नफ़रत किसी पै गुस्सा ये भी सब कर्मों के साये हैं टूटे बंधन रोते हैं हम यही तो कर्मों की माया है मोह के बंधन तोड़ सकें तो कोई न अपना - पराया है सब उसकी ही माया है !!

दृष्टा-425

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दृष्टा बनकर देखो पहले  बुरे विचार मन में ना लाओ करता है सब करने वाला ईश्वर पर विश्वास जमाओ मैं-मैं अपनी दूर भगाकर  देखो उसके खेल निराले अच्छा-बुरा करने वालों के वे ही हैं सबके रखवाले कौन किसी को क्या दे सकता ? ईश्वर ही सब देने वाले  उम्मीद किसी से क्यों करना  जब कर ही दिया सब उनके हवाले सबको अच्छा सोचा कर तू सब ही अच्छे लगने लगेंगे तेरे दु:खों-तेरे कष्टों को केवल गुरुवर ही दूर करेंगे वे ही सारे कष्ट करेंगे !!

शुकराना -424

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शुकराना तेरा है प्रीतम तूने मुझको गले लगाया प्यार की छांव में मुझे बिठाकर तूने अमृत पान कराया छककर अमृत पीता रहा मैं प्याला खाली होता गया ना जाने बिन देखे कैसे तू भी प्याला भरता गया जब-जब मुझको लगता ऐसे रीता होता जाता है सब तब अनदेखे अनजाने ही सब औकात से ज़ियादा देता गया शुकराना... शुकराना प्रीतम प्रेम प्याला पिलाता गया मुझको अपना बनाता गया !!