कुछ यूं है तेर शुकराना-429


कुछ यूं है तेरा शुकराना... ऐ मेरे रहबर,

जैसे तपती दोपहर में, किसी ने छांव की चादर ओढ़ा दी हो

और रूह को... बाहों में समेट लिया हो!

वो जो एक प्याली थमाई थी ना तूने?

मैं घूंट-घूंट पीता रहा...

हैरत ये थी कि प्याली खाली तो होती थी,

पर सूखती नहीं थी कभी!

मैं देखता रहा... और तू ना जाने कहाँ से, बिना नज़र आए,

चुपके-चुपके उसे लबालब भरता गया।

जब-जब लगा कि अब सब रीता हो जाएगा,

खर्च हो जाऊंगा मैं...

तब-तब, बिना कोई आहट किए,

तूने मेरी हैसियत से कहीं ज्यादा,

मेरी हथेलियों पर रख दिया।

क्या कहूँ... बस शुकराना है तेरा!

वो जो इश्क और इनायत का घूंट पिलाया है ना तूने,

उसी ने... मुझे कतरा-कतरा, तेरा कर दिया है !!

                       🙏🙏

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

कर्म -426

शुकराना -424