मां की यादें 430

इक नन्हा सा साया था,

जाने कब... मेरे साए से भी बड़ा हो गया।

कल ही की तो बात लगती है,

इन हथेलियों में सिमट जाने वाला,

आज सबकी फिक्र ओढ़े, खुद से ही बेपरवाह हो गया।

वो छत की मुंडेर पर...

खामोशी से घंटों अकेले खेलना,

बचपन में भी जैसे, वो कोई गहरी सी उम्र जी रहा था।

बगैर किसी शिकायत, बगैर किसी आस के,

सबके हिस्से की धूप, चुपचाप पी रहा था।

मुझे समझ ही नहीं आया...

कब मेरा वो अल्हड़ सा बच्चा,

इतनी खामोशी से समझदार हो गया।

सबकी उंगलियां थाम कर रास्ते दिखाते-दिखाते,

इस माँ के अंधेरों का, इकलौता मदार हो गया।

पैंतीस बरस...

उम्र की शाख से पैंतीस मौसम यूं गिरे,

कि पता ही न चला।

कब उसने घर की तमाम ज़िम्मेदारियां,

किसी पुरानी सर्द शॉल की तरह, अपने कंधों पर डाल लीं।

मेरी इस छोटी सी बगिया की, सारी पतझड़ उसने खुद सम्हाल ली।

आज सोचती हूँ, क्या दुआ दूँ उसे?

मेरी दुआओं के लफ्ज़ भी, उसके कद से अब छोटे लगते हैं...

बस एक ही गुज़ारिश है, उस आसमान वाले से,

मेरी उम्र की डायरी में, जितने भी पन्ने बचे हैं अब...

वो सारे के सारे, मेरे नाम से काटकर,

चुपके से... उसकी उम्र में जोड़ दे।

                     

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