कान्हा मेरे -419

कान्हा मेरे वँशी तुम्हारी,
मन को कितना रिझाती है ।
वँशी की धुन सुन के गोपियॉ,
दौड़ी-भागी आती हैं ।

कैसे इशारे होते तुम्हारे,
कैसे तुम उनको बुलाते हो ।
कोई भी उनको रोक न पाता,
चुम्बक ऐसा लगाते हो ।

तेरा इठलाना,तेरी निगाहें,
सब कुछ तेरा है अलबेला ।
तभी तो सबको छोड़ भागतीं,
आते ही तेरी मधुर बेला ।

तेरा ध्यान और तेरी प्रीति,
सब कुछ तो कर जाती है।
मनुआ मेरा कहीं न भटके,
ऐसा प्यार वो पाती है ।

दिल के गोकुल,मन की मथुरा से,
तन द्वारिका पहुँचा ही दिया ।
बॉध के सब कुछ प्रेम-पाश में,
रूप निराला दिखा ही दिया ।

मेरे कान्हा इसी तरह तुम,
वशीभूत करते रहना ।
तेरे इशारे चले ये मनुआ,
कसके डोर पकड़े रहना ।
 .....ढीली डोर न कभी छोड़ना ।

                                👣🙏

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