शुकराना -424

शुकराना तेरा है प्रीतम
तूने मुझको गले लगाया
प्यार की छांव में मुझे बिठाकर
तूने अमृत पान कराया
छककर अमृत पीता रहा मैं
प्याला खाली होता गया
ना जाने बिन देखे कैसे
तू भी प्याला भरता गया
जब-जब मुझको लगता ऐसे
रीता होता जाता है सब
तब अनदेखे अनजाने ही सब
औकात से ज़ियादा देता गया
शुकराना... शुकराना प्रीतम
प्रेम प्याला पिलाता गया
मुझको अपना बनाता गया !!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426