घर परिवार-395
घर परिवार के साथी मेरे जाने अनजाने रिश्ते मेरे जो अब मेरे साथ नहीं हैं सशरीर अब पास नहीं हैं याद पुरानी जब आ जाती है मुझको बहुत रुला जाती है कैसे फ़िर से मिलन हो उनसे बहुत सी बातें कहूं मैं उनसे मुझसे जो भी भूलें हुईं हैं नादानी में ग़लतियां की हैं कैसे अब मिलकर मैं उनसे अब्बा हो फ़िर रूठूं उनसे अच्छे बुरे का खेल ये सारा याद मुझे आता है दोबारा बचपन से अब तक केअपने आ जायें एक बार वो मिलने उनको गले लगाकर रो लूं ग़लती हुई तो माफ़ी मांग लूं जब भी सब अपने याद आते हैं मुझको तो बहुत रुला जाते हैं!! @शशिसंजय