सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-11

अगले माह हम जेल के ड्रामा हॉल में पहुँचे तो सभी बन्दी भाई बहुत ही खुश दिख रहे थे।पूछने पर पता चला कि उन भाइयों में से एक भाई के घर से कई सालों बाद कोई मिलने आया था और वही नहीं, सभी इसे गुरुकॄपा मान रहे थे और बताने के लिए हमारा इन्तज़ार कर रहे थे।
हम सब भी उनकी खुशी में शामिल होगये, और सबकी व्यथा सुनने लगे कि किस तरह सालों से किन-किन के घर से आज तक कोई नहीं आया।अब समझ आया कि ये लोग हमारे आने से इतना खुश क्यों होते हैं।पुरुष जेल होने के कारण महिलाओं को अन्दर आने की इजाजत नहीं थी, अब गायत्री परिवार में महिलायें और पुरुष अन्दर आ रहे थे, तथा यज्ञ के साथ गुरुदेव-माताजी के प्रवचन वीडियो के माध्यम से सुन भी रहे थे।अच्छा लग रहा था उन्हें ! कोई मॉ,कोई बहन,कोई बेटी और बेटा जैसे प्यार भी करते थे हम सभी को तथा यदि वे लोग कुछ ग़लती कर दें तो डॉट भी खा लेते थे।पारिवारिक माहौल बन रहा था धीरे-धीरे, हमें भी जाने की याद आती थी और उन्हें भी हमारे आने का इन्तज़ार रहता था, जब सारी बातें हो गयीं तो यज्ञ किया तथा कर्मकांड की किताब से मंत्रों का अभ्यास कराने लगे।जो भाई पिछली बार रूठ गया था वह आज बहुत खुश था, क्यों कि सबके साथ बोलने पर वह बीच-बीच में जो ग़लत बोलता, उसे या तो झिड़क देता या फ़िर जोर से उसकी शिकायत करने लगता।दीदी देखो बार-बार मना करने पर भी गलत बोल रहा है, उसका चेहरा देखने लायक होता था जैसे नेता हो वहॉ सभी का।हम भी बच्चों में बच्चा बन जाते,और बाकी सब की तरफ़ मुस्कुराते हुए उन्हें प्यार भरी फटकार लगा देते, अरे भइया सही-सही बोलो।एक बार हम बोलते तथा दूसरी बार वे सभी दोहराते, इस तरह यज्ञ एवं प्रशिक्षण साथ-साथ चल रहा था। सभी में होड़ लगी थी आगे बढ़ने की, जो गुरुदेव माताजी की ही प्रेरणा काम कर रही थी उन सभी में ।
                                 क्रमशः!
                          'गुरु कृपा केवलम्'
                      "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                 👣🙏

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