सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-7

राखी का त्यौहार विशेष होता था हम सभी के लिए।पहले त्यौहार पर हम लोग नहीं गये, उसके बाद रविवार को जब गये तो सभी बन्दी भाईयों ने रोष प्रकट किया।पूछने पर पता चला कि उन सभी ने राखी के दिन हम सभी का बहुत इन्तज़ार किया।जिनके घर से कोई नहीं आता था वे लोग छोटे बच्चों जैसे रोने लगे,आखिरकार यह तय हुआ कि हमारे इस अपराध की सजा यह है कि अगले रविवार राखी का त्यौहार विशेष मनाया जायेगा, वैसे तो गणेश चतुर्थी के दूसरे दिन ॠषि पंचमी को भी राखी का त्यौहार  मनाया जाता है,लेकिन 19 दिन इन्तज़ार कौन करे।जैसे सबके घर वाले खाने के लिए कुछ लाते हैं वैसे ही थोड़ा सा हमें भी लाना है।बड़ी मुश्किल में आ गये क्या किया जाये, कारागार की अपनी मर्यादा हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता है  ? अन्त में प्रशासन से अनुमति लेकर व्यवस्था के लिए निकल पड़े ।सबसे पहले राखियाँ खरीदनी थी 1200 भाई थे मेरे ! 2-4 भी नहीं।गुरुदेव की अनन्य कृपा का ही परिणाम था कि राखियाँ और घेबर (मिठाई विशेष जो इन्हीं दिनों बनती है) तथा थोड़ा-थोड़ा नमकीन हम सभी के आपसी सहयोग से व्यवस्था हो गई । अक्सर भाई--!बहनों के लिए किसी तरह जुगाड़ बिठाता है लेकिन यहॉ भाइयों के लिए झोली फैलाकर एक बहन गुहार लगा रही थी । कुछ की निगाह में ये गलत था क्यों कि वे अपराधी थे उनकी दृष्टि में । उनको भला क्यों कुछ दिया जाए।कुछ ने ताने देने के बाद थोड़ा सा सहयोग भी किया।भावनाओं का क्या किया जाए ?  एक बहन के लिए तो इस समय वे केवल भाई थे उसके ।
उसे तो राखी का त्यौहार मनाना था राखी के एक सप्ताह बाद । उसे न तो किसी के अपराध पता थे और ना ही जानने में कोई रूचि थी क्यों कि इस समय तो भावनाओं का ज्वार हिलोरें ले रहा था ।ऐसे में शायद इन्द्रियॉ भी काम करना बन्द कर देती हैं । जैसे-तैसे वह दिन आ ही गया जब आज राखी बॉधनी है सभी को।जैसे ही जेल का पहला द्वार पार किया तो जाली के दूसरी तरफ इन्तज़ार में काफी भाई खड़े थे,दूसरा द्वार पार करते ही हाथ से सामान लेकर ड्रामा हॉल में लेकर गये, जहॉ प्रशासन की तरफ़ से उन्हें पंक्तिबद्ध बिठा रखा था । सन्नाटा छा गया । कुछ देर बाद 'एक तुम्हीं आधार सदगुरू'गाकर देवमँच पर पूजा की ।उसके बाद राखी बॉधने का सिलसिला शुरू हुआ । बहुत ही खुशी और ग़म का माहौल था,कुछ रो रहे थे तो कुछ खुश हो रहे थे । आज भी याद आती है उस मुसलमान भाई की जो लिपटकर खूब देर तक रोता रहा, जब शान्त हुआ तो मैंने पूछा क्या हुआ  ? तो बोला मेरे पास कुछ भी नहीं है अब मैं क्या दूँगा आपको  ? बीते आठ सालों में कोई नहीं आया मुझसे मिलने, अब आप मिले हो तो मेरे पास बहन को देने के लिए कुछ भी नहीं  ? बहुत प्यार किया उसको हम सभी ने । ख़ास तौर पर मेरी मॉ जैसी शान्ति सक्सैना आन्टी,जो साक्षात करूणा की मूर्ति थीं ,गले लगा लिया उन्होंने ? और उससे बोलीं कि-बेटा अच्छी तरह रहना, भीतर और बाहर भी ।बस यही तुम्हारी बहन का नेग है । जब अधीक्षक महोदय को राखी बॉधीं तो भावुक होकर बोले-आप अखबारों में खबर के लिए नहीं आते, दिल से आते हैं यही मुझे बहुत अच्छा  लगता है ।
                        क्रमशः  !
                                  'गुरुकॄपा केवलम्'
                               "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
               
                                           👣🙏

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