सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-14
महिला जेल में विभिन्न गतिविधियों के चलते भी शीला अपने बच्चे को साथ ही रखती थी,अब उसे हमसे प्यार हो चला था,जेल परिसर में सब्जियां उगाना,निराई-गुड़ाई करना, सिलाई सीखना आदि काफ़ी काम थे, लेकिन फ़िर भी उन्हें हम सभी का इन्तज़ार रहता, अब अमावस्या की जगह एकादशी (ग्यारस) के दिन जाने लगे थे हमलोग, क्यों कि अमावस्या महीने में एक बार ही आती है तथा ग्यारस महीने में दो बार आती है और इस तरह उन बहनों ने माह में दो बार बुलाने की इज़ाजत प्रशासन के द्वारा हमें कहलवाकर दिला दी,जबकि हम लोग माह में एक दिन ही जाना चाहते थे।लेकिन गुरु इच्छा के आगे नतमस्तक थे।शायद उन्हें गुरुदेव की लीला से परिचय ज्यादा पाना था, संगीत और उद्बोधन के माध्यम से गुरुदेव की बात कहकर अन्त में आरती और प्रसाद वितरण जब सबको किया जाता,तभी शीला दौड़ कर जाती और न जाने कहाँ छुपाकर रखी हुई चटनी और आधी रोटी सफ़ेद साड़ी के पल्लू में छुपाकर लेकर आती और कसम खिलाते हुये कहती, दीदीजी, अपने हाथ से बनाई है आप चखो तो ! सबसे कहती, लेकिन सब ग्यारस का व्रत कहकर मना कर देते, व्रत तो मेरा भी था,किन्तु भावनाओं के सामने मजबूर हो जाती और सोचती कि गुरु...