सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-10
पुनः पूर्णिमा को जब पहुँचे तो ड्रामा हॉल में सभी भाई एकत्रित थे, न जाति-पॉति का कोई भेद, ना ही ऊँच-नीच की परवाह।सभी की ऑखें बाहर की ओर झॉक रही होती थीं। किसी एक ने भी अग़र देख लिया कि हम पहुँच गये हैं, तो झट से ड्रामा हॉल में ख़बर पहुँच जाती और सब शांत होकर बैठने का नाटक करते। देवमँच पहले ही तैयार कर देते थे, हवन की तैयारी भी प्रायः कर लिया करते थे, जो कमी रह जाती, उसे हम सब मिलकर पूरा कर देते थे। संगीत और उद्बोधन के बाद जब यज्ञ शुरू करने को हुये तो मेरी निगाहें बराबर किसी को ढूँढ रहीं थीं,और वह था रूठा हुआ भाई कमलेश।मालूम पड़ा कि वह बैरक में चला गया है, हमें समझते देर न लगी कि अभी हमारे प्यार में गड़बड़ है।उसे बुलवाया तो आ गया, पूछा- अब क्या हुआ ? तो शिकायतों की पोटली खुल गई, सब कुछ अच्छा था,लेकिन ब्राह्मण होने का अंहकार ? किसी ने मंत्र बोलने का अभ्यास करते समय कुछ गलती निकाल दी,बस उसे खूब खरी-खोटी भी सुनाई और रूठ भी गये ? बहुत समझाया तब कहीं यज्ञ में बैठे। कभी-कभी ऐसा महसूस होने लगता था कि जैसे ये सभी बहुत छोटे बच्चे हैं और हम बहुत बड़े हो गये हैं । ख़ैर----जो भी हो गुरुदेव की लीला वे ही जानें, ये ज़रूर था कि जितना सुकून उन लोगों को मिलता था, उससे कहीं ज़्यादा हमें भी अच्छा लग रहा था। सबके हाथों में यज्ञ की किताबें थीं, जो पढ़ पा रहे थे वे लोग पढ़ रहे थे ।
सबने अपनी-अपनी पारियों में यज्ञ सम्पन्न किया।दरअसल हमारे पास एक ही हवनकुंड था,इसलिए समय काफ़ी लग जाता था।हमें मन में घर पहुँचने की जल्दी ज़रूर होती थी, लेकिन उन लोगों का मन नहीं भरता था, ऐसा इसलिए नहीं --? कि हममें कोई विशेष बात थी वरन् इसलिए कि जिनके घर वाले मिलने आते थे, वे जाली में से ही मिल पाते थे, शोर में आवाज़ भी ठीक से नहीं सुन पाते थे, और कुछ भाई जब से अन्दर आये थे तब से कोई भी मिलने नहीं आया था,शायद यही वज़ह थी कि हमारा देर तक रुकना उन्हें अच्छा लगता था,और हमें घर जाने की जल्दी इसलिए होती थी कि घर जाकर सारा काम करना होता था, ज्यादातर बहनों के यहाँ बहुयें, कामवालियां आदि सुविधाएं थीं,लेकिन यहाँ तो हम दोनों ही काम वाले और काम वाली थी।ऊपर से सबसे छोटा बेटा (जिसकी उम्र लगभग ढाई वर्ष थी)दोनों किडनी में गड़बड़ी हो जाने के कारण जिन्दगी और मौत से जूझ रहा था,हमारे यज्ञ कराने जाने पर दोनों बड़े बेटे(जिनकी उम्र क्रमशः 12 और 11 वर्ष की थी) ही उसे सँभाला करते थे । आस-पड़ोसी और रिश्तेदारों को बहुत खराब लगता था
कि कैसे लोग हैं जो मरणासन्न बच्चे को छोड़कर जाने कहाँ-कहाँ जाते हैं ? लेकिन मन के संकल्प और दृढ़ विश्वास का क्या करें,जो स्वयं गुरुदेव ने स्वप्न में आकर दिया था कि तुम हमारा काम करो, हम तुम्हारा काम करेंगे, मैंने रोते हुए कहा-गुरुदेव मेरा काम तो मेरे इस बच्चे को बचा दीजिए, क्यों कि डाक्टरों ने कहा है कि अमेरिका ले जाओ,आपका काम क्या है मुझे नहीं मालूम।गुरुदेव के चरणों में सिर रखकर लगातार रो रही थी कि अचानक गुरुदेव ने तीन बार ज़ोर देकर कहा-यज्ञ करा-यज्ञ करा-यज्ञ करा ! ऑख खुली सुबह के साढ़े तीन बजे थे,तकिया ऑसुओं से भीगा हुआ था। समझ नहीं आ रहा था कि मैं यज्ञ कैसे करा सकती हूँ, मुझे सिखायेगा कौन ? तीन छोटे बच्चों को लेकर शान्तिकुन्ज(हमारा आश्रम/गुरुद्वारा) भी नहीं रह सकती, सब कुछ समझ से परे था, लेकिन गुरुदेव को तो पता था कि इस काया से कैसे काम लेना है और उन्होंने काम भी लिया तथा बच्चे को जीवन दान भी दिया, बिना किसी प्रशिक्षण के। जो भी सिखाया उन्होंने ख़ुद ही सिखाया अपनी सूक्ष्म शक्ति से। यह केवल और केवल गुरु ही कर सकते हैं, शायद और कोई भी नहीं ।
क्रमशः!
'गुरुकृपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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