सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-13
कुछ दिनों तक तो रात को नींद नहीं आती थी हम दोनों को,लगता था कि बाहर की घटनाओं ने इन्हें अन्दर भेजा और यहाँ आकर भी अंहकार की लड़ाई।इसी सोच-विचार में कब सुबह हो जाती, पता ही नहीं चल पाता।सुबह से फिर वही रोज़ की दिनचर्या, घर के कार्यों को निबटाने के बाद नौकरी जाना, वहॉ से एक बार घर आकर बच्चों को सॅभालना और फ़िर गुरुदेव के कार्य के लिए निकल पड़ना।
आज जब अतीत याद आता है तो लगता है कि गुरुदेव की शक्ति ही थी,जो इस शरीर से घर,नौकरी, अनुष्ठान, एवं अनाथाश्रम,बालिका सदन,नारी निकेतन, महिला जेल और पुरुष जेल सभी जगह कुशलतापूर्वक कार्य करा रही थी, अक्सर देखने में आता है कि पति-पत्नी के रास्ते अध्यात्म के मामले में अलग-अलग होते हैं, लेकिन यहॉ तो गुरुदेव ने हम दोनों को विचारों की एक ही डोरी से बॉध रखा था, इसीलिए गुरुदेव के कार्यों के लिए हमारी मानसिकता एक जैसी थी,भले ही और कार्यों में मतभेद भले ही हो जाते हों।
महिला जेल में जब गये तो वहां भी दुख कम नहीं थे।वहॉ पर यज्ञ से शुरुआत नहीं की,क्यों कि महिलाओं को गाने-बजाने में ज्यादा रूचि होती है, सोचा कुछ दिनों तक ऐसे ही काम किया जाये,संगीत के बाद गुरुदेव का सन्देश सुनाना,उसके बाद एक-एक का परिचय लेना।लगभग 150 महिलायें थीं।थोड़ा समय लगा समझने-समझाने में।वे आसानी से अपने बारे में नहीं बताना चाहती थीं, लेकिन एक बात जरूर है कि महिला ही महिला की दुश्मन होती हैं।एक बहन जो बहुत बोलती थी, उसने धीरे-धीरे सबके बारे में बताना शुरू किया-ये शीला (परिवर्तित नाम) है इसने अपने पति को मार डाला वो शराब पीकर बहुत मारता था इसे। (धीरे-धीरे बताने लगी, बदमाश है आप ज्यादा मुँह मत लगाना दीदी जी) हमें भी अपराध पता होने से ठीक रहता था ताकि उसके व्यवहार के हिसाब से हमें आगे बढ़ने में आसानी हो।
कुछ महीनों में धीरे-धीरे सभी बहनों में आत्मीयता का विस्तार होने लगा। जैसे ही "एक तुम्हीं आधार सदगुरू" गाना शुरू करते शीला ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर देती,जहाँ तक मुझे लगता है कि गुस्सा भी उन्हें शायद ज्यादा आता है जिन्हें या तो प्यार का अभाव रहा हो या फिर लाड़-प्यार ज्यादा मिला हो,जो भी हो, उसका रोना देखकर ख़ुद रोने को जी चाहता था, लेकिन ऐसा नहीं कर सकते थे।जब शीला को हमारे ऊपर विश्वास हो गया तो एक दिन अकेले में उसके सिर को बहुत देर तक सहलाने के बाद मैंने पूछा-बेटा क्या हुआ तुमसे ? काफ़ी देर के प्रयास के बाद गोदी में सिर रखकर रोती रही, जो उसने बताया-सुनकर लगा कि उसने कोई अपराध नहीं किया वरन् अच्छा किया।उसके मॉ-बाप ने मजबूरी में पैसे लेकर उसकी शादी अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दी थी, उसका पति खुद के अलावा अन्य लोगों से संबंध बनाकर पैसे कमाता और शीला के मना करने पर उसे मारता। घुट-घुट कर, मर-मर कर जी रही थी वह।पीहर वालों से कोई वास्ता न बचा था उसका। आखिर खुद से फैसला लिया कि अब ये नर्क की जिन्दगी नहीं जीनी और पति को गढ़सा से मार डाला, एक बच्चा भी था गोदी में उसके । उसका फैसला सही था या ग़लत यह तो गुरुदेव ही जानें लेकिन ये जरुर तय है कि किसी का भी इतना ग़लत शोषण मत करो कि वो ऐसा क़दम उठाने पर मजबूर हो।
इन सबसे दिमागी तौर पर परेशान होने पर यह याचिका हमारे प्रिय भाई वक़ील श्री वाई.सी.शर्मा जी द्वारा याचिका लगाई गई थी, जिस पर निम्न निर्देश सरकार द्वारा दिये गये थे-
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें