सलाखों के अन्दर गायत्री साधना--12

हर बार की तरह इस बार भी हम यज्ञ के बाद प्रश्न और उत्तर देने के चक्रव्यूह में फँस गए।जहाँ तक समझ आया, जबाब दिये और जहाँ कुछ पल्ले नहीं पड़ा वहॉ उन्हें ख़ुद किताब पढ़ने तथा हम ख़ुद भी पढ़कर आयेंगे, कहकर अन्य समस्याएं सुनने का वक्त आ गया। इस तरह हम सभी में पढ़ने का उत्साह बढ़ रहा था, उधर पुस्तकालय में रखवाई गई किताबों को पढ़ने का उत्साह बंदी भाइयों में भी बढ़ रहा था।इसी बीच वही हर बार रूठ जाने वाला भाई 
(कहावत है कि-'एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा',) बस उसने अपनी पंडिताई झाड़नी शुरू कर दी,मैं भी ब्राह्मण हूँ, गायत्री वालों में कोई ब्राह्मण नहीं होता है यहाँ पर भी सभी 
जाति के अपराधी हैं आप सबको मत सिखाओ, सारी बातें सुनने के बाद, शांति माताजी ने उसके सिर पर प्यार से  हाथ फेरते हुए कहा कि ऐसा नहीं है, तुम्हारी इस बहन की बात समझो ये तो ब्राह्मण है, ये कितने प्यार और धैर्य से तुम 
सबको समझाती है यदि तुम बार-बार परेशान करोगे तो इसका गुस्सा भी बहुत खराब है, फिर हम लोग आना बन्द कर देंगे ,बाद में किससे बहस करोगे।सचमुच अब तो पक्का विश्वास होने लगा था कि औरों का तो पता नहीं किन्तु मुझे तो अवश्य ही अपनी सजा काटने भेजा है, इतनी सहनशीलता बनाकर बात करना, छोटी-छोटी बातों पर उनकी लड़ाइयों को निबटाना, भीतर के क्रोध को दबाकर आगे की सोचना,शायद गुरुदेव मेरे धैर्य की परीक्षा ले रहे थे, बाकी सभी साथ जाने वाले देवस्वरूप थे।ख़ैर---
जैसे भी संभव हुआ, समझा-बुझाकर हम अधीक्षक महोदय के कमरे में आते थे, वे प्रेमानुसार चाय नाश्ता कराकर ही हमें भेजते थे,यज्ञ की अन्तिम पारी में अधीक्षक का सम्मिलित होना तथा आरती करके यह कहते हुए अपने चैम्बर में चले जाना कि आप लोग मिलते हुये जाना,मिलने के बहाने चाय के साथ वे बंदियों के बारे में हमें बताते जाते और हमसे भी उनके बारे में पूंछते जाते कि महिला होने के नाते हमें कोई परेशानी तो नहीं हो रही।हम उन्हें बंदियों के बारे में ज्यादा कुछ न बताकर यही कहते कि वे सभी रूचि ले रहे हैं, यह भी सच्चाई थी,कोई झूठ नहीं।
असल में जब पहली बार हम पुरुष जेल में कार्यक्रम की इज़ाजत लेने गये तो अधीक्षक महोदय ने चोंकते हुये कहा था कि आपके यहॉ पुरुष कार्यकर्ता नहीं हैं क्या  ? मैडम यह पुरुष जेल है, तब हमारे बार-बारआग्रह के बाद वे तैयार हो गये, इस शर्त पर कि सब कुछ ठीक-ठाक चला तो लगातार आने देंगे अन्यथा हमें कोई पुरुष कार्यकर्ता भेजने होंगे।हमने हॉमी भर ली और इस तरह हमारा जाना शुरू हो गया।
                                     क्रमशः!
                               'गुरुकॄपा केवलम्'
                          (गुरुवर शरणम् गच्छामि)
                                     👣🙏

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