क्या याद करूं--412
क्या याद करूं क्या भूलूं मैं कुछ समझ नहीं मुझको पड़ता बस एक बात जो चलती है दिल पीछे दौड़ चला करता जीवन की अंतिम घड़ियों में क्या खोया है क्या पाया है ये चक्र जो घूमा चारों तरफ तो सोचा सब कुछ खोया है दौड़ा करते कुछ बनने को बन जाने और बनाने को वह सब कुछ पीछे छूट गया अब बैठे घुटने जुड़वाने को है चारों तरफ ही सन्नाटा सब खोया पाया सा लगता है पक्षी जब गूंजा करते हैं संगीत वही मन भाता है उड़ जायेगा मन का पंछी तब और कहीं जा जन्मेगा फिर इसी तरह की व्याकुलता लिए वह बार बार ही जूझेगा !! शशिसंजय 13/5/2020