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अमृतवाणी--199

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(हमारी सुनिश्चित भविष्यवाणी) भगवान् की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है। इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिये सबसे बड़ी दूरदर्शिता है। अगले दिनों में पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है। धन एवं सम्पत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है। हर व्यक्ति अपनी रोटी मेहनत करके कमायेगा और खायेगा। कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है। अगले दिनों इस तथ्य को अक्षरशः सत्य सिद्ध करेंगे। इसलिये वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह पूर्वक निवेदन है कि वे पूँजी बढ़ाने, बेटे पोतों के लिये जायदादें इकट्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें। राजा और जमींदारों को मिटते हमने अपनी आँखों देख लिया अब इन्हीं आँखों को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए। भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी ...

लहलहाती--410

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लहलहाती--410 =========== लहलहाती हरियाली और झूमकर गीत गाते दरख़्तों ने सही है पीड़ा ख़ुद भी अपनी मां पृथ्वी के साथ केवल वृक्ष वनस्पति ही क्यों ? वह हमारी भी तो मां है तभी तो.... जन्म से लेकर मृत्यु तक हम पृथ्वी मां की.... गोद में ही चिपके रहते हैं और वह प्यारी मां चिरकाल तक अपने प्यार से हमें पालती-पोसती है बड़े ही धैर्य के साथ पर हम अभागी औलादें उसका दिल हमेशा से छलनी करती ही आईं हैं हरियाली को मिटाकर अंधाधुंध बहुमंजिली इमारतें  बनाकर ढेर सारे रसायनों का ज़हर उसके कलेजे में डालकर तभी तो आज उस मां ने हमें फटकार कर.... घर पर बैठने को मजबूर कर दिया है (कोरोनावायरस के चलते लांकडाउन) अपनी संतानों से मिले घावों को भरने के लिए प्रकृति मां भी कभी कभी ऐसे कदम उठाने को.... मजबूर हो ही जाती है सिर्फ़ और सिर्फ़.... अपनी... संतानों को सुधारने के लिए!!                        @शशिसंजय                            22/4/2020

बहुत दिन--409

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बहुत दिन गुजर गए याद अभी भी बाकी है दर पर तेरे जाने का उल्लास अभी भी जारी है मन कहता है तुम आस-पास पर स्थूल का दिखना बाकी है ना साधना है ना तप है कोई तब सूक्ष्म भी दिखना बाकी है कुछ बातें हैं-कुछ यादें हैं कुछ जो तुमने लिख डाला उनको पढ़कर-उनमें खोकर तेरा अक्स ढूंढना जारी है !!                             @शशिसंजय                                 18/4/2020

कोरोना--408

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तुम्हें क्या लगता है क्या है ये कोरोना सभी डरे सहमे हुए हैं और तुम बेफिक्र की तरह ध्यानस्थ हुए बैठे हो शायद इसीलिए कि तुम्हें यह अंदाजा काफ़ी अरसे पहले ही हो चुका था तभी तो तुमने मानव जाति को आगाह भी किया था और न जाने कितनी साधनाएं ख़ुद ने कीं और दूसरों से भी कराईं और आज भी करा ही रहे हो क्योंकि तुम हमेशा कहा करते थे कि जहां से विज्ञान फेल होना शुरू होता है वहीं से आध्यात्म.... अपना काम शुरू कर देता है कोरोना यानी किये गये कर्मों का प्रतिफल भले ही किसी ने भी किया हो भुगतना तो सभी को पड़ता है लेकिन..... मुझे पता है कि तुम पूरी सृष्टि की रक्षा किसी न किसी रूप में अवश्य कर रहे हो इसीलिए तो ध्यान मुद्रा में हो अनवरत मेरे गुरुदेव.... मेरे दाता.......!!                                   @शशिसंजय                                         5/4/2020

श्रीराम--407

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श्रीराम के वंशज हैं हम हम सबके वे भगवान हैं आराध्य भी-गुरु भी वही मां भगवती के साथ हैं आज फ़िर रावण (महामारी) से वे युद्ध का उद्घघोष करते साधना की शक्ति से गुरु विश्व को हैं मुक्त करते जिसके जो आराध्य हैं सब उनसे ही विनती करें प्रभु आज फ़िर से आप इस रावण से सबकी रक्षा करें !!                                   @शशिसंजय

विश्वास की डोर--406

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विश्वास की डोर से बंधे हो तुम तुम्हारे सिवा... भरोसा नहीं है किसी पर मुझको तभी तो याद आता है... तुमसे दूर जाने का वो दिन जब श्रद्धा और विश्वास से बनाई गई फूलों की मालाओं को गले में पहनाने की बजाय तुम्हारे दोनों चरणों में इस तरह बांध दिया मैंने जैसे मां यशोदा अपने लाड़ले को... कहीं भाग जाने के डर से बांध दिया करतीं थीं और तुम.... तुम देखकर मुस्कराये ही जा रहे थे शायद यह सोचकर कि पगला गया हूं मैं.... वो गुलाब के फूल जो कांटों से निकलकर तुम्हारे लिए हार बनकर आये थे उन्हीं गुलाब के कांटों में अपने लिए जगह बना रहा था मैं तुझसे मोहब्बत भला कांटों की सेज से कम तो नहीं तभी तो लोग इस राह पर चलने वालों को पागल करार कर दिया करते हैं !!                             @शशिसंजय                                  19/3/2020

शादी की रस्म--405

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शादी की रस्म अदायगी में कंगना खुलाई की एक रस्म हुआ करती है जिसमें दूल्हा और दुल्हन के हाथों में बंधे धागों की ढेर सारी गांठें एक दूसरे से खुलवाई जाती हैं रस्म का तो पता नहीं कि किसने बनाई होगी लेकिन... इतना तो जरूर तय है कि जीवन में कभी किसी के प्रति मन में दुर्भावनाओं की गांठें लग भी जायें तो.... उन्हें हमेशा खोलते रहना ताकि रिश्तों की मिठास बनी रहे यही प्रेरणा रही होगी इस रस्म के पीछे लेकिन इतना आसान नहीं... मन को खुला रखना... अतीत और वर्तमान की... कढ़वी गांठों की पोटलियों को मजबूत हाथों से खोलना कुछ भी हो... मगर खोलनी तो पड़ेंगी ही  मन की और दिल की गांठें अन्यथा चुभती ही रहेंगी हमेशा ही रिश्तों में पड़ी ये गांठें शायद इसीलिए खुलवाई जाती होंगी दूल्हा दुल्हन से ये मजबूती से बांधी गई ये बहुत सारी गांठें !!                       @शशिसंजय                            18/3/2020