क्या कहूँ मैं तुमसे परवरदिगार मेरे, सब पर तुम्हारी रहमतों का साया बना रहे!! हमारी ये उलझनें मकड़ी के जाले की तरहॉ हैं एक तुम हो कि उनमें से भी रास्ता निकाल देते हो!! मेरे सतगुर...
घटना १४ जुलाई १९८९ की है। विनोदानंदजी की शादी शांतिकुंज के यज्ञशाला प्रांगण में होना निश्चित हुई। श्रद्धेय आचार्यगण द्वारा विवाह संस्कार के वेदमंत्रों के छन्दबद्ध उच...
“ईश्वर विराट् स्वरुप में सभी जगह समाहित है - वृक्ष, पुष्प, पत्तियां, पर्वत, सागर इत्यादि। एक समय आयेगा, आना पडेगा, जब व्यक्ति उस एक सर्वव्यापक विश्वमय स्वरुप को वास्तव में अन...
अंगिरा ऋषि का शिष्य उदयन बड़ा प्रतिद्वंद्वी था। वह सदैव यही चाहता था कि पहले उसे ही प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका मिले या लोग सिर्फ उसी का प्रदर्शन देखते रहें। इसलिए वह सहयोगियों से अलग अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास करता था। अंगिरा ऋषि ने उदयन की इस वृत्ति को पहचानकर सोचा कि यह प्रशंसा पाने की लालसा है। प्रशंसा पाकर इसके भीतर अहंकार का जन्म होगा। यह वृत्ति इसे ले डूबेगी। अतः उसे समय रहते ही समझाना होगा। सर्दी के दिन थे। अंगिरा ऋषि अपने शिष्यों के साथ सत्संग कर रहे थे। बीच में रखी अंगीठी में कोयले दहक रहे थे। अचानक वे बोले, 'कैसी सुंदर अंगीठी दहक रही है। इसका श्रेय क्या अंगीठी में दहक रहे कोयलों का है? ' उदयन के साथ अन्य शिष्यों ने भी हामी भरी। फिर अंगिरा ऋषि ने एक बड़े चमकदार अंगारे की ओर इशारा करके कहा, 'देखो, यह कोयला बड़ा और सबसे ज्यादा तेजस्वी है। इसे अंगीठी से निकालकर मेरे पास रख दो। मैं बूढ़ा हूं, अतः ऐसे तेजस्वी अंगारे का लाभ करीब से लूंगा। ' उदयन ने एक चीमटे से पकड़कर वह अंगारा ऋषि के समीप रख...
तुमसे क्या छुपाऊँ, तुम जानते हो सब कुछ दुनिया के देखने से,कुछ फ़र्क नहीं पड़ता!! मुझसे ज़्यादा चिन्ता, रहती है तुमको मेरी इससे अधिक उम्मीदें, मैं क्या लगाऊँ तुमसे!! जितना दिया...
तू ही तू है सारे जग में तेरे सिवा कुछ और न दिखता फ़िर भी मैं हूँ मैं को पाले मैं का अंहकार ना मिटता सारे काम तेरे निपटाते सब कुछ अच्छा सा कर जाते तू है भिखारी उनके दर का वो दाता ...
🔵 दिसम्बर २००८ की बात है। उन दिनों मैं नए वर्ष के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ एवं ‘युग निर्माण योजना’ के सदस्य बनाने में व्यस्त थी। उसी समय मेरे साथ एक भयानक किन्तु आश्चर्यजनक घटना...