गुरुगीता-87
अंगिरा ऋषि का शिष्य उदयन बड़ा प्रतिद्वंद्वी था। वह सदैव यही चाहता था कि पहले उसे ही प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका मिले या लोग सिर्फ उसी का प्रदर्शन देखते रहें। इसलिए वह सहयोगियों से अलग अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास करता था। अंगिरा ऋषि ने उदयन की इस वृत्ति को पहचानकर सोचा कि यह प्रशंसा पाने की लालसा है। प्रशंसा पाकर इसके भीतर अहंकार का जन्म होगा। यह वृत्ति इसे ले डूबेगी। अतः उसे समय रहते ही समझाना होगा।
सर्दी के दिन थे। अंगिरा ऋषि अपने शिष्यों के साथ सत्संग कर रहे थे। बीच में रखी अंगीठी में कोयले दहक रहे थे। अचानक वे बोले, 'कैसी सुंदर अंगीठी दहक रही है। इसका श्रेय क्या अंगीठी में दहक रहे कोयलों का है? ' उदयन के साथ अन्य शिष्यों ने भी हामी भरी। फिर अंगिरा ऋषि ने एक बड़े चमकदार अंगारे की ओर इशारा करके कहा, 'देखो, यह कोयला बड़ा और सबसे ज्यादा तेजस्वी है। इसे अंगीठी से निकालकर मेरे पास रख दो। मैं बूढ़ा हूं, अतः ऐसे तेजस्वी अंगारे का लाभ करीब से लूंगा। ' उदयन ने एक चीमटे से पकड़कर वह अंगारा ऋषि के समीप रख दिया। फिर सब लोग पहले की तरह बातचीत करने लगे।
थोड़ी ही देर में वह अंगारा मुरझा गया। उस पर जल की परत जम गई। वह बुझा हुआ राख भर रह गया। इस पर अंगिरा ऋषि बोले, 'बच्चो, तुमने देखा? आप चाहे जितने तेजस्वी हों, लेकिन इस कोयले जैसी भूल मत कर बैठना। अंगीठी में वह अंत तक तेजस्वी बना रहता है और सबके साथ मिलकर अन्त तक गर्मी देता है। लेकिन अब इसमें वह तेज नहीं है कि हम इसका कोई फायदा उठा सकें । ' उदयन के साथ-साथ दूसरे शिष्य भी समझ गए कि ऋषि परिवार की परंपरा वह अंगीठी है जिसमें प्रतिभाएं संयुक्त रूप से आगे बढ़ती हैं। व्यक्तिगत प्रतिभा का अहंकार न तो टिकता है और न ही फलित होता है।
गुरुगीता पाठ-
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यं यं चिन्तयते कामं तं तमाप्नोति निश्चितम् ।
कामिनां कामधेनुश्च कल्पितस्य सुरद्रुम: ।।93।।
अर्थ-
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गुरुगीता पाठक जिस जिस कामना की चिन्ता करता है, वह
वह वॉछित विषय निश्चित लाभ करता है। यह ग्रन्थ प्रार्थीगण की कामधेनु और संकल्प का कल्पतरू है ।।93।।
93.
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'Kam Dhenu' for the aspirants and is like a
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