अमृतवाणी-183
“ईश्वर विराट् स्वरुप में सभी जगह समाहित है - वृक्ष, पुष्प, पत्तियां, पर्वत, सागर इत्यादि। एक समय आयेगा, आना पडेगा, जब व्यक्ति उस एक सर्वव्यापक विश्वमय स्वरुप को वास्तव में अनुभव करेगा। उसके आकार व रुपों की विविधता असीम है, असंख्य है, अनन्त है। जैसे बर्फ जल के अतिरिक्त कुछ नहीं है, वैसे ही उस प्रियतम का न तो कोई आकार है और न ही कोई गुण है। अतः उसके प्रकट होने का प्रश्न ही नहीं उठता। जब यह बात समझ आ जाती है तो व्यक्ति स्वयं को भी समझ लेता है। इस प्रकार प्रियतम को पाना ही स्वयं को पाना है अर्थात् यह जानना कि ईश्वर मेरा ही आपा है, मेरे से पूर्णतः अभिन्न है और मेरा अन्तरम् है। हम जिसका आह्वान करना चाहते हैं, सर्वप्रथम उसके आत्मीय बनने के लिए, निरंतर उसका चिंतन, भजन, श्रवण करो, उसका दर्शन करो, उसका गुणगान करो अथवा वाणी से सद्चर्चा करो, तीर्थयात्रा करो, एकान्तवास करो या फिर सत्संग करो। “ऐसी स्थिति प्राप्त कर लेने पर तुम उन्हें ‘माता’ या ‘पिता’ कहकर पुकार सकते हो,। उनके संग इस प्रकार का कोई संबंध स्थापित करना आवश्यक है क्योंकि किसी सुनिश्चित संबंध के अभाव में सांसारिक व्यक्ति निकटता का अनुभव नहीं कर पाता है। सांसारिक जीवन में तुम्हें स्वजनों से संबंध बनाने का अभ्यास है इसीलिये आध्यात्मिक जीवन में भी तुम्हें इसी प्रकार के किसी संबंध से बंधना पड़ेगा। “संभव है, प्रारंभ में तुम्हारे अंदर गहरी श्रद्धा न हो परंतु निरंतर उनका जप करते हुए अथवा किसी अन्य विधि से तब तक उनका आवाह्न करना सीखो जब तक वह तुम्हारी हर सांस में बस जाएँ।
“यद्यपि प्रेम का बंधन स्थापित हो चुका है परंतु फिर भी उसके लिए प्रार्थना, ध्यान या उसके नाम पर दिया दान तथा अन्य विधियाँ इस बंधन को दृढ़ रखने के लिए आवश्यक हैं। इस प्रकार उसका ध्यान तुम्हारा स्वभाव हो जाएगा जो मृत्यु पर्यन्त तुम्हें नहीं छोड़ेगा। इसी को ईश्वर से एकाकार होना कहते हैं।
"मॉ आनन्दमयी"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें