संदेश

साधक(सामाजिक)-98

साधक कहते हैं जो ख़ुद को कभी साधना का मर्म ना जाने दुखियारों का दु:ख ना पूछे अंहकार बस रहे हैं पाले सीना ताने चलते हैं वो अनुशासन सब को सिखलाते ख़ुद अनुशासन सीख ना पाये बड़ी-बड़ी बातें बतलाते दम के बल पर-धन के बल पर जो तुम आये हो इठलाते मरते दम तक सुधर न पाये संग में कुछ ना ले जा पाये छोड़ यहीं पर सब जाना है फिर काहे का घमंड दिखाना मरने के बाद सूक्ष्म शरीर से फिर आपस में सब मिलने आना                  💔💔🖤💔💔

प्रेम गली(आध्यात्मिक)-99

प्रेम गली में रहकर भी तू बाहर गलियन में भागत है मन को क्यों भटकावत बैरी तू बार-बार क्यों जावत है प्रेम पियारा भीतर बैठा तुझको भीतर ही बुलावत है भीतर की सुध छोड़ के बन्दे तू बाहर में क्यों भागत है  जो कुछ है सो भीतर ही है छद्मवेष सब बाहर हैं तू ना जाने तू ना माने ये तो सब जग ज़ाहिर है भीतर ही सब बात बनत है तू बाहर ही भटकत है प्रीतम तेरी राह तकत है तू भीतर क्यों ना जावत है               👣🙏🏻

दिले शायरी -20

--जब दिल को अपना विश्वास होता है   बीते समय का कुछ ख़याल होता है   कोई कितनी भी धूल उड़ाये   उसका सभी एहसास बेकार होता है --किसी के कहने से कुछ हो नहीं जाता    बदनाम करने से वो बदना...

सजदा(आध्यात्मिक)-100

सजदा किया जब चरणों में तेरे मुझको जाने क्या महसूस हुआ अजब तरंगें अजब सी ख़ुशबू  जिनका अच्छा सा भान हुआ ग़ज़ब की ठंडक अजब सी गर्मी मुझको कैसा ये अहसास हुआ छोड़ी जो तुमने शक्ति तुम्हारी मेरा तभी तो ऐसा हाल हुआ मुर्दे की सी अकड़ का मुझमें जब-जब भी सँचार हुआ तब-तब तुमने आकर मुझको अपने हाथों प्यार से छुआ  हाथ तुम्हारा मेरे सिर पर यूँ ही हमेशा बना रहे मेरे दाता प्यार की पुलकन अकड़ को मेरी मिटाती रहे                 👣🙏🏻

ख़ुद -ब-ख़ुद(सामाजिक)-101

ख़ुद -ब-ख़ुद आकर तुम जुड़ते चले जाते हो ना जाने कितनी परेशानियॉ अपनी बताते चले जाते हो धीरे से ही सही-दु:ख से ही सही अन्दर तक दिल के गहरे चले जाते हो दुनिया रुसवाई करे तो दु;खी हो जाते हो जब तुम ख़ुद ही रुसवाई करो तो खूब ख़ुश हो जाते हो पीठ के पीछे से जो भोंकते हो खँजर लौटकर फिर वो ही खँजर तुम ख़ुद भी खाये जाते हो सोचते नहीं हो यहॉ सब लौटकर ही आता है बोते जो बीज तुम औरों के लिये वक़्त की मार के साथ तुम ख़ुद ही उसके फल खाये जाते हो                   💔💔🖤💔💔

आप आयें(आध्यात्मिक)-102

आप आयें या न आयें  दिल में बसाये रखियेगा जब भी मुझको याद सताये  दिल में ही मुझको दिखियेगा अन्तर्मन में जब साज बज उठें तब संग में आप भी रहियेगा ज्यों-ज्यों भाव हिलोरें जागें मुझको सँभाले रखियेगा राग-द्वेष से बचकर निकलूँ हाथ को पकड़े रहियेगा लोभ-मोह की चादर को  दूर ही मुझसे रखियेगा भाव कभी भी बिगड़ न पायें मन ऐसा बनाये रखियेगा सत्कर्मों की बाढ़ बढ़ी रहे बस ऐसे ही चलाये  रखियेगा                    👣🙏🏻

ना कुछ लेना(सामाजिक)-103

ना कुछ लेना ना कुछ देना फिर क्यूँ तुम सब इतराते हो देखके शक्लें आपस में तुम क्यूँ इधर-उधर छितराते हो एक पिता की सन्तानें सब फिर है ये कैसा इतराना मात-पिता के गुण ना आये तो ये व्यवहार बड़ा बचकाना काम भले ही कितना कर लो गुरुसत्ता ही सबसे कराती है "मैं" का अंहकार तुम पालो दुर्बुध्दि ये सब भरमाती है मात-पिता हैं बड़े ही निराले सारा तमाशा देखा करते हैं ऐसी सन्तानें देख के वो भी दु:ख के घूँट पीया करते हैं               💔💔🖤💔💔