ना कुछ लेना(सामाजिक)-103

ना कुछ लेना ना कुछ देना

फिर क्यूँ तुम सब इतराते हो

देखके शक्लें आपस में तुम

क्यूँ इधर-उधर छितराते हो

एक पिता की सन्तानें सब

फिर है ये कैसा इतराना

मात-पिता के गुण ना आये

तो ये व्यवहार बड़ा बचकाना

काम भले ही कितना कर लो

गुरुसत्ता ही सबसे कराती है

"मैं" का अंहकार तुम पालो

दुर्बुध्दि ये सब भरमाती है

मात-पिता हैं बड़े ही निराले

सारा तमाशा देखा करते हैं

ऐसी सन्तानें देख के वो भी

दु:ख के घूँट पीया करते हैं

              💔💔🖤💔💔

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