प्रेम गली(आध्यात्मिक)-99
प्रेम गली में रहकर भी
तू बाहर गलियन में भागत है
मन को क्यों भटकावत बैरी
तू बार-बार क्यों जावत है
प्रेम पियारा भीतर बैठा
तुझको भीतर ही बुलावत है
भीतर की सुध छोड़ के बन्दे
तू बाहर में क्यों भागत है
जो कुछ है सो भीतर ही है
छद्मवेष सब बाहर हैं
तू ना जाने तू ना माने
ये तो सब जग ज़ाहिर है
भीतर ही सब बात बनत है
तू बाहर ही भटकत है
प्रीतम तेरी राह तकत है
तू भीतर क्यों ना जावत है
👣🙏🏻
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें