ख़ुद -ब-ख़ुद(सामाजिक)-101
ख़ुद -ब-ख़ुद आकर तुम
जुड़ते चले जाते हो
ना जाने कितनी परेशानियॉ
अपनी बताते चले जाते हो
धीरे से ही सही-दु:ख से ही सही
अन्दर तक दिल के
गहरे चले जाते हो
दुनिया रुसवाई करे तो
दु;खी हो जाते हो
जब तुम ख़ुद ही रुसवाई करो
तो खूब ख़ुश हो जाते हो
पीठ के पीछे से जो भोंकते हो खँजर
लौटकर फिर वो ही खँजर
तुम ख़ुद भी खाये जाते हो
सोचते नहीं हो यहॉ सब
लौटकर ही आता है
बोते जो बीज तुम औरों के लिये
वक़्त की मार के साथ तुम
ख़ुद ही उसके फल खाये जाते हो
💔💔🖤💔💔
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें