विश्वास की डोर--406
विश्वास की डोर से बंधे हो तुम तुम्हारे सिवा... भरोसा नहीं है किसी पर मुझको तभी तो याद आता है... तुमसे दूर जाने का वो दिन जब श्रद्धा और विश्वास से बनाई गई फूलों की मालाओं को गले में पहनाने की बजाय तुम्हारे दोनों चरणों में इस तरह बांध दिया मैंने जैसे मां यशोदा अपने लाड़ले को... कहीं भाग जाने के डर से बांध दिया करतीं थीं और तुम.... तुम देखकर मुस्कराये ही जा रहे थे शायद यह सोचकर कि पगला गया हूं मैं.... वो गुलाब के फूल जो कांटों से निकलकर तुम्हारे लिए हार बनकर आये थे उन्हीं गुलाब के कांटों में अपने लिए जगह बना रहा था मैं तुझसे मोहब्बत भला कांटों की सेज से कम तो नहीं तभी तो लोग इस राह पर चलने वालों को पागल करार कर दिया करते हैं !! @शशिसंजय 19/3/2020