मन की होली--400
मन की होली खेलूं तुमसे
मन को अपना कर डालो
रंग बिरंगे फूलों से कुछ
इत्र से अब महका डालो
तन तो बेसुध पड़ा रहे बस
ध्यान में तेरे डूबी रहूं
इतना गहरी चली जाऊं मैं
दर पर तेरे पड़ी रहूं
दुनिया की कुछ ख़बर रहे ना
इतना बेख़बरी कर डालो
मोह लोभ का रंग चढ़े ना
ऐसा मुझ पर रंग डालो
तोड़ के सारे मोह के बन्धन
अपने बन्धन में कर डालो
तेरे सिवा ना कोई जग में
पक्का सबक ये रटवा दो
खेलूं होली तुमसे केवल
हर पल मेरा ऐसा हो
रंग बिरंगे रूप तुम्हारे
देख के मन खुश होता हो !!
@शशिसंजय
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