संदेश

परिवर्तन(व्यक्तिगत)-38

परिवर्तन जीवन और प्रकृति का नियम है ज़िन्दगी की दौड़-धूप के बाद अब आराम में आ गया हूँ मैं  परिवार के साथ समय बिताना अच्छा लगता है.......! घर-परिवार.... घर यानी ख़ूनी रिश्ते परिवार यानी सब(इंसान,पशु,पक्षी,जीव,जन्तु) सभी मेरे अपने ख़ुशी का पर्याय हैं सभी तो अपने हैं न जाने पिछले कितने जन्मों में बार-बार मिलते रहे होंगे तभी तो वर्तमान जीवन में भी सभी लोग मिलते और बिछुड़ते रहते हैं सृष्टि का यही नियम है परिवर्तन......! परिवर्तन........! और परिवर्तन........!            💔💔🖤💔💔

बेपनाह(व्यक्तिगत)-39

बेपनाह  मोहब्बत है तुमसे पता नहीं क्यूँ  शायद इसलिये कि नज़दीक में काफ़ी अरसे से तुम्हारा अभाव था घर के तूफ़ानी लड़कों के बीच रहते-रहते और जीवन के संघर्षों के चलते मैं भी मन से... न जाने कब कुछ कठोर बन बैठी तुम्हारे आने से,फिर वही मासूमियत  शरारतें,बचपन की उछल कूद सब कुछ वापस लौट आया है तुम चिराग़ हो इस घर का दिल का टुकड़ा हो हम सबका तुम्हारी शरारतों में हम सबकी शरारतें छिपी हैं.... प्यारी बच्ची एैज़िल 

ऑखिन देखी(सामाजिक)-40

 मेरे ही एक मित्र जो दिन भर व्यस्त रहते थे सबका हाल-चाल जानने में उनकी अपनी एक अलग ही दुनिया थी फोन की  व्यस्त से व्यस्ततम अचानक फोन आना बंद मैसेज आना बंद काफ़ी दिनों के बाद पता चला कि वे अब....... दुनिया छोड़ चुके हैं अन्दर तक हिला दिया उनके व्यक्तित्व ने इतने मिलनसार लेकिन..... अब परिवार को पूछने वाला कोई नहीं कहॉ गये वे सभी चाहने वाले..... एक बार तो पूँछ लेते कि.... अब मैसेज और फोन नहीं आ रहे..... दोस्त कहॉ हो..... कहॉ हो तुम.... कैसे हो.... तुम्हारे परिवार को कुछ.... सहायता.... भाव संवेदनायें... अपनापन चाहिये क्या......?              💔💔🖤💔💔

गुरुपूर्णिमा(आध्यात्मिक)-41

गुरु की गाथा क्या कहूँ सब कुछ उनकी देन रहमत उनकी देखकर बरसत हैं ये नैन मन जब भी विचलित हुआ तुरत संभाला आय हर पल किसी भी रूप में करते रहे सहाय मन और वाणी करम से बन न सके उन जैस फिर भी वो अपनाय रहे हम जैसे थे तैस          👣🙏🏻

भीड़(आध्यात्मिक)-42

जमाने भर की भीड़ छाई है चारों तरफ़  इर्द-गिर्द फ़ेसबुक-वाट्सएप आदि-आदि कभी सोचता हूँ कितने अपने हैं इनमें से कितने सच्चे हैं ? इनमें... कुछ तो टाइम पास करने के लिये कुछ मस्ती के लिये कुछ ज्ञान बॉटने के लिये कुछ बतियाने के लिये कहॉ से कहॉ तक जुड़ते जाते हैं पता भी नहीं कौन कहॉ रहता है ये सब जानते बूझते भी दिन चला जाता है फोन पर हालाँकि व्यवस्था अच्छी है नेटवर्किंग की..... फिर भी कभी-कभी ये ख़याल आता है कि... यदि ये नेटवर्क  उससे जुड़ जाता हमेशा के लिये जिसने ज़िन्दगी दी है दुनिया दिखाई है और तो और ? सबसे पहचान कराई है....? कितना ही ख़ुशनुमा होता वो पल.....!            💔💔🖤💔💔

भावना(सामाजिक)-43

भावना बहती नहीं है अब कहीं संसार में देखो कितना आ गया सब फेर इस बाज़ार में भाव के सागर कहीं अब.... सूख से गये हैं सारे भाव के बिन.... तड़पते हैं संसार के सब व्यक्ति सारे अन्तर को जो छू सके कुछ ऐसा भाव चाहिये  आपसी विश्वास हो बस ऐसा भान चाहिये तम का अँधेरा दूर हो ऐसा उजाला चाहिये आपस में प्यार हो संसार ऐसा चाहिये         💔💔🖤💔💔

फ़ितरत(सामाजिक)-44

पहचान प्रतिष्ठा पद सम्मान क्या कुछ.... नहीं पाना चाहते सभी लोग जबकि.... जानते हुये भी कि थोड़े समय का खेल है ये सब कुछ भी साथ नहीं गया आज तक और तो और काया भी यहीं छोड़कर जानी पड़ती है जान-पहचान वाले यहॉ तक कि रिश्तेदार भी जीते जी भूल जाते हैं अगर आप काम के नहीं क्यों कि..... ये फ़ितरत है दुनिया की ये फ़ितरत है समाज की इसे तुम बदल नहीं सकते कोई बदल भी नहीं सका है फिर..... क्यों भागते हैं इस सबके पीछे आख़िर क्यों ?           💔💔🖤💔💔