भीड़(आध्यात्मिक)-42
जमाने भर की भीड़
छाई है चारों तरफ़
इर्द-गिर्द
फ़ेसबुक-वाट्सएप
आदि-आदि
कभी सोचता हूँ
कितने अपने हैं इनमें से
कितने सच्चे हैं ? इनमें...
कुछ तो टाइम पास करने के लिये
कुछ मस्ती के लिये
कुछ ज्ञान बॉटने के लिये
कुछ बतियाने के लिये
कहॉ से कहॉ तक जुड़ते जाते हैं
पता भी नहीं कौन कहॉ रहता है
ये सब जानते बूझते भी
दिन चला जाता है फोन पर
हालाँकि व्यवस्था अच्छी है
नेटवर्किंग की.....
फिर भी कभी-कभी
ये ख़याल आता है कि...
यदि ये नेटवर्क
उससे जुड़ जाता
हमेशा के लिये
जिसने ज़िन्दगी दी है
दुनिया दिखाई है
और तो और ?
सबसे पहचान कराई है....?
कितना ही ख़ुशनुमा होता
वो पल.....!
💔💔🖤💔💔
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