बेपनाह(व्यक्तिगत)-39

बेपनाह 

मोहब्बत है तुमसे

पता नहीं क्यूँ 

शायद इसलिये कि

नज़दीक में काफ़ी अरसे से

तुम्हारा अभाव था

घर के तूफ़ानी लड़कों के बीच

रहते-रहते और जीवन के संघर्षों के चलते

मैं भी मन से...

न जाने कब कुछ कठोर बन बैठी

तुम्हारे आने से,फिर वही मासूमियत 

शरारतें,बचपन की उछल कूद

सब कुछ वापस लौट आया है

तुम चिराग़ हो इस घर का

दिल का टुकड़ा हो हम सबका

तुम्हारी शरारतों में हम सबकी

शरारतें छिपी हैं....

प्यारी बच्ची

एैज़िल 

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