गुरुगीता-105

ज्ञानगंज से सिद्धों का आदेश विशुद्धानन्द जी को आ गया था कि तुम अपनी स्वतंत्र शिष्य परम्परा नहीं चलाओगे,जबकि इनके उस काल में ही उनके शिष्य गोपीनाथ कविराज को भी गुरु आज्ञा हुई कि तुम भी दीक्षा नहीं दे सकते । यूं तो गोपीनाथ जी ने अपने शिष्य सीताराम दास को गुरु दीक्षा की आज्ञा दी जिन्होंने ये परम्परा चलाई पर ये भी आगे चलकर भंग हो गयी क्योंकि ज्ञानगंज से ही आदेश नहीं था और नाही सूक्ष्म सत्ताओं की दैविक सहायता मिलती थी तो सिद्ध दीक्षा पद्धति चलती ही कैसे ? वाराणसी के कानन आश्रम में कुमारी सेवा की यानि नवरात्रि में विशेष पूजा की व्यवस्था की गयी थी पर वो भी विशेष नहीं चली। ये सब विषय को लेकर मैने कुछ दिनों तक विशुद्धानंद जी को स्मरण का विषय बनाते हुए ध्यान किया,तब देखा कि एक पूजा का कमरा है उसमें एक देवी की प्रतिमा जो जीवंत और दिव्य आभा लिए स्थापित है उसके पास परमहंस पद्मासन में बैठे है और उनके सामने कोई मध्यायु के पुरुष शिष्य दीक्षा को बैठे हैं,तब उन्होंने एक कुशा का कपड़ा मढ़ा हुआ आसन जिसमें उन्हें दिखाते हुए बोले-कि इसमें चारों कोनों पर चार ताबीज लगाये हैं और मध्य में एक ताबीज लगाया है जिससे ये आसन अब सिद्धासन बन गया है,इसमें जितना जप संख्यानुसार बताया जायेगा,उसे करने पर जो चिन्मयकोश बनेगा उससे तुम्हारी साधना खण्डित नहीं होगी । नित्य वहीं से प्राप्त होती रहेगी और स्मरण रहे कि इस पर कोई भी नहीं बैठ पाये अन्यथा ये आसन भंग हो जायेगा। वो शिष्य नमन कर रहे हैं कि ऐसा ही होगा। तब बाबा जी ने कहा कि अब ये तुम्हारे लिए एक ताबीज है,जिसे अपने गले में सदा धारण किये रहना और किसी को छूने नहीं देना है,ये तुम्हारा साधना और जीवन का रक्षा कवच सिद्ध होगा और ये जो गाय का घी लाये हो इससे दिव्य विधि से ज्योत की जा रही है, यों कहते हुए विशुद्धानंद महाराज जी ने मंत्रोउच्चारण किया और उस दीपक में ज्योति प्रज्वलित हो गयी। तब उन्होंने ध्यान लगाया और उस समय ऐसा लगा कि उनके शरीर में जैसे एक के बाद एक तीन दिव्य सत्ताओं का आवाहन होता गया और अब पहले वाले विशुद्धानंद जी में और अब के विशुद्धानंद जी में महान अंतर दिखाई दिया,अब के बाबा में प्रबल विद्युत के आकर्षण शक्ति की ऊर्जा सम्पूर्ण कमरे में तड़ित हो रही थी,जिस के बल से भक्त भी आवेशित हो रहा था। तब बाबा जी ने उसके सिर पर अपना हाथ आशीर्वाद स्वरूप रखा और कोई मंत्रोच्चारण किया। जिससे भक्त पुरुष के शरीर में भी विद्युत तड़ित हुयी और देह भान लुप्त सा प्रतीत हुआ,तब बाबा जी ने आँखें खोली जिनमें से तेज प्रकाशित हो रहा था और बोले कि-अब तुम्हें दिव्य देह की प्राप्ति हो गयी है जिसका भान तुम्हें साधना करते में पता चलेगा और अनेक दिव्यताओं और विभूतियों का समयानुसार अनुभव करोगे और स्मरण रखना कि तुम्हारी पत्नी दीक्षित नहीं है वो तुम्हारे पूजाघर में प्रवेश नहीं करे और तुम भी जागतिक संसारी भाव लेकर वहाँ नहीं जाना,केवल तुम्हारी माता जी ही जा सकती हैं क्योंकि वो तुम्हारी जननी हैं। यों कहते ही पुनः वे ध्यानस्थ हुए और उनके शरीर से वो त्रिसत्ता का भाव मुक्त हुआ लगा और उन्होंने भक्त को कहा जाओ। इस आदेश के साथ ही मुझे भी ध्यान में चेतना होती चली गयी और समयानुसार ज्ञान हुआ कि इनके शरीर में दीक्षा देते समय इनके परम गुरु के उपरांत इनके मूल गुरुदेव की देह का आवेश होता था। तब ये दीक्षा शक्तिपात करते थे और यही रहस्य था कि सूक्ष्म सत्ताओं के सम्पर्क से ही ये सूर्य आदि विज्ञानों का ज्ञान प्राप्त करते हुए चमत्कार करते थे।वैसे भी शक्तिपात का रहस्य है कि जिससे शक्ति मिलती है उसके गुरु क्रमानुसार ही शक्ति क्रम से साधक के शरीर में आवेशित होता है,यहाँ जो भी स्त्री या पुरुष साधक अपने भौतिक शरीर का समर्पण गुरु को नहीं करते हैं उनके शरीर में ये पहले गुरु शक्ति फिर स्त्री शक्ति जिन्हें भैरवी कहते हैं और पुरुष शक्ति जिन्हें भैरव कहते है उनका भावेश नहीं आता है यों इन सबके सूक्ष्म शरीर में मेल होने पर ही साधक का सूक्ष्म शरीर एक प्रबल प्राकृतिक विद्युतीय आवेश से घिर कर एक विद्युतघर बन जाता है तब वो जिस पदार्थ की इच्छा करता है,वही वस्तु प्रकृति में जिस भी स्थान पर उपलब्ध होती है,वे भैरवी या भैरव या स्वमेव साधक का सूक्ष्म शरीर ही आकर्षित कर उसे साधक तक उपस्थित कर देता है,जो सामान्यजन को शून्य से वस्तु उत्पन्न करने के अद्धभुत चमत्कार लगते हैं,ठीक ऐसे ही विज्ञानमय कोष तक ही ये ज्ञानगंज का सिद्ध लोक का प्रभाव और पकड़ है,यों यहाँ और इससे जुड़े सभी साधक चमत्कारी सिद्ध कहलाते हैं। परन्तु इसके लिए गुरु प्रदत्त मन्त्रों का विधिवत नियम से जप करते हुए अपने शरीर को शुद्ध करना पड़ता है और ये नहीं कि आप संसारी कार्यों में भोगों में उस ऊर्जा को खर्च कर दें और चमत्कारों और दिव्यता की अनुभूतियों के भी दर्शनों को देखना चाहे। ऐसा सम्भव नहीं है।ठीक जब मूलाधार खुलता है तब भोग बड़े प्रबल हो जाते है यो उस समय गुरु अनुसार ही ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए ये विषय गुरु से ही बड़े गम्भीर रहस्य को शरणागत होकर जानना चाहिए।
गुरुगीता पाठ
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गुरवो बहवसन्ति शिष्यवित्तापहारका:।
दुर्लभोsयं गुरुर्देवि शिष्यसन्तापहारक:।।111।।
अर्थ
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हे देवि शिष्य का धन हरणकारी अनेक गुरु हैं। लेकिन शिष्य सन्ताप नाशक गुरु दुर्लभ हैं।।111।।।
111.
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Oh Devi,there are many Masters who relieve the disciple of money but the one who relieves the disciple of the miseries is rare.
                             👣🙏

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