सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-2

कारागार में एक और बन्दी रहा कमलाराम(परिवर्तित नाम) मन्दिर की साफ़-सफाई में लगा दिया था उसको, ताकि वह झगड़ा -फ़साद न किया करे और भाइयों से ? वह बहुत छोटी-छोटी बातों पर सभी से झगड़ लिया करता था ।जब मन्दिर में सुबह-शाम की ड्यूटी लगाई तो और लोगों ने आपत्ति जताई कि यह पत्नी की हत्या करके आया है,इसे आपने गुरुजी के काम में क्यों लगाया ? जब मैंने उससे पूछा कि क्या तुमसे ऐसा कुछ हुआ है,तो उसने मना कर दिया । मैंने भी उसकी बात पर भरोसा करके मन्दिर सेवा व जप यज्ञ में शामिल रहने दिया तथा अन्य बंदियों को भी समझा दिया । काफ़ी समय बाद जब वह 20 दिन की पैरोल पर अपने घर आया तो मुझसे मिलने भी आ गया ।
खिलाने-पिलाने के बाद जब चर्चा चली तो मैंने फ़िर बहुत प्यार से कहा-देख बेटा मुझे तो पता है कि तुझसे गलती हो गई , लेकिन तेरे मुँह से सुनना चाहती हूँ ।बस इतना कहते ही वह फूट-फूट कर रोने लगा और बताने लगा कि किस तरह शक के कारण ऐसा हो गया । उसने कहा कि मैं करना नहीं चाहता था लेकिन हो गया । लगभग दो घंटे तक वह रोता रहा तब मैंने उसे कहा कि गुरुदेव के सामने अपना अपराध क़ुबूल करना तथा मंदिर सेवा के साथ अपनी साधना और बढ़ा दे,धीरे-धीरे उसके स्वभाव में भी परिवर्तन आने लगा शांति से अपना अधिक समय वह साधना में लगाने लगा । अपने आपसे बातें करता रहता, नतीजतन और लोग उसे पागल कहने लगे, एक दिन अचानक उसने अन्य बंदियों को बताया कि आज से ठीक 6 महीने बाद में निकल जाऊँगा । सबने सोचा कि पागल हो गया है इसीलिये कुछ भी बोलता है । लेकिन सचमुच ऐसा ही हुआ और वह 14 साल की सजा से बहुत सालों पहले ही बाइज्ज़त बरी हो गया ।यह केवल गुरुकृपा का ही परिणाम था । बाद में उसने बंदियों को एक पत्र सामूहिक लिखकर डाला कि ये बाबा और मॉ (गुरुदेव और माताजी) यहॉ पर साक्षात बैठे हैं , तुम इन्हें केवल मूर्ति मानते हो, मैं पागल नहीं हुआ था, इन्हीं से बात करता रहता था और बाबा  (गुरुदेव) ने ही मुझे कहा था कि हम तुझे 6 माह बाद बाहर भेज देंगे ।

                                           क्रमशः!
                       
                                    "गुरुकॄपा केवलम् "

                                 "गुरूवर शरणम् गच्छामि"
                                             👣🙏

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