गुरुगीता-102

श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान् बुद्ध से मंत्र दीक्षा ली और उनके साथ ही रहकर तपस्या में लग गए। बिरक्त मन को उपासना से असीम शांति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि- मुक्ता की सी ज्योति झिलमिलाने लगाती है, मन- वाणी-चित्त  अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं। साधक को रस मिलने लगता है। तो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किंतु भगवान् बुद्ध की दृष्टि अत्यंत तीखी थी। वह जानते थे रस सब एक हैं, चाहे वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है, इसीलिए जब तक नयापन है, तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है, किंतु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जाएगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार- बार उधर धकेलने लगे। मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था। अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैय्या के स्थान पर भूमि शयन, आकर्षक वेषभूषा के स्थान पर मोटे वल्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक संपर्क के स्थान पर राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा- व्यवस्था एक- एक कर इन सबमें जितना अधिक मेघ को लगाया जाता, उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्त्वाकांक्षाएँ सिर पीटतीं और अहंकार बार- बार आकर खड़ा होकर कहता-'' ओ रे मूर्ख मेघ!  कहाँ गया वह रस। जीवन के सुखोपभोग को छोड़कर कहाँ आ फँसा। '' मन और आत्मा का द्वंद्व निरंतर चलते- चलते एक दिन वह स्थिति आ गई जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे-'' तात ! मुझे तो साधना कराइए तप कराइए जिससे मेरा अंतःकरण पवित्र बने। ''
तथागत मुस्कराए और बोले-'' तात ! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता- यह गुण है। जिसमें आ गया, वही सच्चा तपस्वी, वही स्वर्ग विजेता है। उपासना तो उसका एक अंग मात्र है। '' मेघ की आँखें खुल गईं  और वे एक सच्चे योद्धा की भांति मन से लड़ने को चल पड़ें।
वानप्रस्थ बिना मन के मल्लयुद्ध को जीते नहीं लिया जाना चाहिए। वेश वैसा रहे व मन कहीं औंर, तो वह जीवन तो भौतिक जीवन से भी गया बीता है।
          रैदास के गुरु स्वामी रामानंद साधुवेषधारियों से परिवार के उत्तरदायित्व पूर्ण होने न होने की बात पूछते थे और जिनकी जिम्मेदारियाँ शेष थीं, जो भावावेश में या मुफ्त का निर्वाह- सम्मान पाने के लिए गेरुआ वस्त्र पहने फिरते थे, उन्हें समझा- बुझाकर गृहस्थ में रहकर परमार्थ परायण होने की शिक्षा देते थे।
सदगुरुदेव "दीक्षा" सही व्यक्ति को, सही "समय' पर ही देते हैं।
गुरुगीता पाठ
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अतीव चित्तशान्ते च श्रद्धा भक्ति समन्विते।
प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मासि सदा प्रिये।।108।।
अर्थ
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Oh,Devi,Oh,beloved one you are my soul.Reveal it to a person who possesses extremely peaceful chitt and possesses
faith and devotion.
COMMENTS:
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You are my beloved disciple and the deserving one, that is why I have revealed it to you.similarly you will also
reveal it to the deserving ones.
                              👣🙏

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