अमृतवाणी-196

मोक्ष प्राप्त करने वाली आत्माओं की संख्या अपरिमित है। उनमें से कुछ तो पौधों में हैं, कुछ पशुओं में, कुछ मनुष्यों में तथा कुछ देवताओं में हैं। पर सब-के-सब - उच्चतम देवता भी - अपूर्ण हैं, बंधन में हैं। यह बंधन क्या है? जन्म और मरण की अपरिहार्यता। उच्चतम देवों को भी मरना पड़ता है। देवता क्या हैं? वे विशिष्ट अवस्थाओं या पदों के प्रतीक हैं। उदाहरणस्वरूप, इंद्र जो देवताओं के राजा हैं, एक पद विशेष के प्रतीक हैं। कोई अत्यंत उच्च आत्मा इस कल्प से उस पद पर विराजमान हैं। इस कल्प के बाद पुनः मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होगी और इस कल्प में जो दूसरी उच्चतम आत्मा होगी, वह उस पद पर जाकर आसीन होगी। ठीक यही बात अन्य सभी देवताओं के बारे में भी है। वे विशिष्ट पदों के प्रतीक हैं, जिन पर एक के बाद एक, करोड़ों आत्माओं ने काम किया है और वहाँ से उतरकर मनुष्य का जन्म लिया है। जो मनुष्य कल की आकांक्षा से इस लोक में परोपकार तथा अच्छे काम करते हैं और स्वयं अथवा यशप्राप्ति की आशा करते हैं; वे मरने पर देवता बनकर अपने किये का फल भोगते हैं। याद रहे कि यह मोक्ष नहीं है। मोक्ष, फल की आशा रखने से नहीं मिलता। मनुष्य जिस किसी भी चीज की आकांक्षा करता है; ईश्वर उसे वह देता है। आदमी शक्ति चाहता है, पद चाहता है, देवताओं की भाँति सुखचाहता है; उसकी इच्छाएँ तो पूरी हो जाती हैं, पर उसके कर्म का कोई शाश्वत फल नहीं होता। एक निश्चित अवधि के बाद उनके पुण्य का प्रभाव समाप्त हो जाता है - चाहे वह अवधि कितनी ही लंबी क्यों न हो। उसके समाप्त होने पर उसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा और तब वे देवता पुनः मनुष्य हो जाएँगे और उन्हें मोक्ष-प्राप्ति का दूसरा अवसर मिलेगा। निम्न कोटि के पशु क्रमशः मनुष्यत्व की ओर बढेंगे, फिर देवत्व की ओर, और तब शायद पुनः मनुष्य बनेंगे अथवा पशु हो जाएँगे। यह क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक वे वासना से रहित नहीं हो जाते, जीवन की तृष्णा को छोड़ नहीं देते और ‘मैं और मेरा’ के मोह से मुक्त नहीं हो जाते। यह ‘मैं और मेरा’ ही संसार में सारे पापों का मूल है। अगर तुम किसी द्वैतवादी से पूछो कि क्या तुम्हारा बच्चा तुम्हारा है? तो फौरन वह कहेगा - “यह तो ईश्वर का है; मेरी संपत्ति मेरी नहीं, बल्कि ईश्वर की है।’’ सबकुछ ईश्वर का है - ऐसा ही मानना चाहिए।
                     स्वामी विवेकानंद
              साभार: मैं कौन हूं (पुस्तक से)

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