अमृतवाणी-197
तुम्हीं वास्तविक विश्व-देवता हो; बल्कि दो की भावना ही अयर्थाथ है - एक ही तो सत्ता है। ‘तुम और मैं’ कहना ही गलत है, केवल ‘मैं’ कहो। मैं ही तो करोड़ों मुँह से खा रहा हूँ; फिर मैं भूखा कैसे रह सकता हूँ? मैं ही तो करोड़ों करों से काम कर रहा हूँ; फिर मैं निष्क्रिय कैसे हो सकता हूँ? मैं ही समस्त विश्व का जीवन जी रहा हूँ; मेरे लिए मृत्यु कहाँ है? मैं जीवन और मृत्यु के परे हूँ। मुक्ति की खोज कहाँ करूं? मैं तो स्वभाव से ही मुक्त हूँ। मुझे - इस विश्व के ईश्वर को बाँध कौन सकता है? संसार के धर्मग्रंथ मानो छोटे-छोटे नक्शे हैं जो मेरी महिमा को, मुझ अनंत विस्तारी सत्ता को चित्रित करने का प्रयास करते हैं। ये पुस्तकें मेरे लिए क्या हैं? इस प्रकार अद्वैतवादी कहते हैं। ‘सत्य को जान लो और क्षण भर में तुम मुक्त हो जाओ।’ सारा अज्ञान भाग जाएगा। जब एक बार मनुष्य विश्व की अनंत सत्ता से अपने को एकीभूत कर लेता है, जब विश्व की सारी पृथकता विनष्ट हो जाती है, जब सारे देवता और देवदूत, नर-नारी, पशु और पौधे उस ‘एकत्व’ में विलीन हो जाते हैं - तब कोई भय नहीं रह जाता।
क्या मैं अपने आपको चोट पहुँचा सकता हूँ? अपने को मार सकता हूँ? क्या मैं अपने को आघात पहुँचा सकता हूँ? डरना किससे? अपने आपसे डर कैसा? जब ऐसा भाव आ जाएगा तब समस्त दुःखों का अंत हो जाएगा। मेरे दुःख का कारण क्या हो सकता है? मैं ही तो समस्त विश्व की एकमात्र सत्ता हूँ। तब किसी से ईर्ष्या नहीं रह जाएगी; क्योंकि ईर्ष्या किससे? स्वयं से? तब समस्त अशुभ भावनाएँ समाप्त हो जाएँगी। किसके विपक्ष में मैं अशुभ भावना रख सकता हूँ? स्वयं के विरुद्ध? विश्व में मेरे सिवा और है कौन? और वेदांती कहता है कि ज्ञान प्राप्ति का ही एकमात्र मार्ग है। विभेद के भाव को विनष्ट कर डालो, यह अंधविश्वास विविधता का अस्तित्व है, इसे समाप्त कर डालो। “जो अनेकता में एकता का दर्शन करता है, जो इस अचेतन जड़ पिंड में एक ही चेतना का अनुभव करता है, एवं जो छायाओं के जगत् में ‘सत्य’ को ग्रहण कर पाता है, केवल उसी मनुष्य को शाश्वत शांति मिल सकती है और किसी को नहीं, और किसी को नहीं।’’
स्वामी विवेकानंद
साभार: मैं कौन हूं (पुस्तक से)
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