अद्भुत आश्चर्य जनक किन्तु सत्य-32

आज से करीब आठ वर्ष पहले की बात है। मैं झारखण्ड राज्य के भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की जिला संयोजक थी। भा.सं.ज्ञा.परीक्षा सम्पादित कराने हेतु मुझे अक्सर झारखण्ड के कई जिलों का दौरा करना पड़ता था। एक बार मैं झींकपानी चाईबासा होकर वापस जमशेदपुर आ रही थी। अचानक एक जगह आकर हमारी बस रुक गई। आगे का रास्ता जाम था।बस कण्डक्टर ने बताया कि बस आगे नहीं जायेगी।आप लोगों को जाना हो तो निजी वाहन ऑटो रिक्शा आदि से जा सकते हैं।पता चला कि आज सरहूल है।यह इस क्षेत्र का प्रसिद्ध त्यौहार है, जिसमें हजारों हजार नर नारी इकट्ठे होकर नाचते गाते खुशियां मनाते हैं। देखा, सड़क के दोनों ओर लगभग पांच-सात हजार लोग अपने पारम्परिक वेशभूषा में पंक्तिबद्ध खड़े होकर एक दूसरे की कमर पकड़ कर नृत्य कर रहे हैं।सभी का शरीर एक साथ एक ताल पर आगे पीछे,दांये बांये झुक रहे थे।
            झारखण्ड की संस्कृति की झांकी को प्रस्तुत करता नृत्य उत्सव का वह अपूर्व दृश्य भी मुझे बांध न सका। बार-बार घिरती हुई सांझ की ओर देखती
और मन कहता जल्दी घर पहुंचना है। बहुत से लोग बस से उतर-उतर कर पैदल ही अपने रास्ते की ओर चल दिए।बस के कर्मचारी वहीं विश्राम की तैयारी करने लगे। हमें बता दिया गया कि यह कार्यक्रम अभी तीन-चार घण्टे तक चलेगा।मजबूर होकर मुझे भी उतर जाना पड़ा।
                   मुझे उस स्थान के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि उस स्थान को हाता के नाम से जाना जाता है। मुझे किसी ने बताया कि जमशेदपुर जाने के लिए पश्चिम की ओर चलना होगा।इसी आधार पर मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ने लगी। धीरे-धीरे अंधेरा
घिर आया। सुनसान सड़क पर इक्के-दुक्के लोग ही चल रहे थे। सड़क के दोनों ओर क्या है, आगे वाले रास्ते में खाई है या खन्दक, रोड़ा है या कीचड़ यह भी नहीं दीखता। मैं अनायास कदम बढ़ाती जा रही थी।बगल की कंटीली झाड़ियों से कई बार पांव भी ज़ख्मी होते जा रहे थे,मगर मेरे मन में केवल एक बात आ रही थी कि समय रहते घर पहुंचना है। एकअनजाना सा भय मुझे दबाये जा रहा था। अकेली औरत, सुनसान सड़क,क्या कुछ नहीं हो सकता था। लेकिन मुझे घर पहुंचने की जल्दी थी।
                अचानक मैंने ख्याल किया कि मेरे आगे-आगे सफेद धोती पहने लम्बे कद के कोई पुरुष चल रहे हैं। उनके कमर के ऊपर का हिस्सा नहीं दीख रहा था। मुझे भय भी लग रहा था मगर उन्हीं के साथ-साथ कदम मिलाती हुई पीछे-पीछे चली जा रही थी। मुझे लग रहा था कि आगे वाले व्यक्ति के कदम तीन-तीन फीट पर पड़ रहे हैं। पता नहीं मैं कैसे उस गति से चल रही थी।उस समय यह सब सोचने के लिए भी समय नहीं था। जैसे मेरे क़दम हवा में पड़ रहे थे।कष्ट की अनुभूति भी नहीं हो रही थी। करीब आधे-पौन घंटे तक इसी तरह चलती गई।
इसके बाद शहरी इलाका दीखने लगा। दुकानों की झिलमिल रोशनी देख मन में साहस आया। इसके बाद वह व्यक्ति भी न जाने कब आंखों से ओझल हो गया।
          एक टेलीफोन बूथ पर जाकर मैंने फोन किया। घर में सूचना दी।विलम्ब होने का कारण बताया। वहीं पूछने पर पता चला कि उस स्थान का नाम परसूडीह है। वहां से ऑटो रिक्शा लेकर मैं बस स्टैंड गई, जहां से साकची की बस मिलने वाली थी।
                 जब घर पहुंची और सब हाल बताया, तो सभी विस्मय से अवाक रह गए। कहां-हाता से परसूडीह तुम इतनी जल्दी पहुंची कैसे ? वह तो 25-30 किलोमीटर का रास्ता है। मुझे आगे-आगे चलने वाले उस मार्गदर्शक की याद आई।क्षद्धा से नतमस्तक हो गई मैं। गुरुदेव कई बार कहा करते थे-बेटा, तुम मेरे काम में एक क़दम भर बढ़ाओ, मैं तुम्हें सफलता के रास्ते दस कदम बढ़ा दूंगा।
प्रस्तुति:-सुषमा पात्रो
टाटा नगर (झारखण्ड)
साभार:-(अद्भुत आश्चर्य जनक किन्तु सत्य पुस्तक से पृष्ठ संख्या 16)

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