अमृतवाणी-176/177/178

देवियो! भाइयो!!

🔶 कल आपको उपासना की महत्ता के बारे में बताया जा रहा था। भगवान के नजदीक आप बैठें, उपासना करें, तो देखेंगे कि उनके सारे गुण आप में आते चले जाते हैं। बिजली को छूता है, तो उसके अन्दर करेण्ट आ जाता है। भगवान् को जो छुएगा, भगवान से उसमें करेण्ट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में जोड़ दें, तो नीचे वाले तालाब का लेवल बढ़ता हुआ चला जाता है और दोनों का तल एक हो जाता है। भगवान और भक्त एक हो जाते हैं। सच तो ये है भक्त भगवान से भी बड़े हो जाते हैं; क्योंकि भगवान भक्त का उत्साह बढ़ाना चाहते हैं और दूसरे कामों में उपयोग करना चाहते हैं।

🔷 शबरी के जूठे बेर भगवान ने खाये थे न! गोपियों के यहाँ भगवान छाछ माँगने गए थे न! बलि के दरवाजे पर बावन अंगुल के बन करके भगवान गए थे न! कर्ण के दरवाजे पर सोना माँगने के लिए साधु और भिखारी का रूप बनाकर गए थे न! ये बड़प्पन है, भक्त का बड़प्पन। भृगु ने भगवान के सीने में लात मारी थी, कहाँ कैसे भगवान हैं! जो अपने कर्तव्य का ध्यान नहीं रखते और भगवान ने महर्षि भृगु की लात के निशान को अपनी छाती पर अभी तक सुरक्षित रखा हुआ है। विष्णु की मूर्तियों में महर्षि भृगु की लात का निशान बना रहता है। महर्षि भृगु बड़े थे भगवान से। 

🔶 भक्त बड़ा होता है भगवान से; पर सही भक्त होना चाहिए। सही भक्त की कल हम आपको पहचान बता चुके हैं और ये बता चुके हैं कि भक्त को भगवान के अनुशासन पर निर्भर रहना चाहिए; भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए; अपनी मनोकामना की बाबत ध्यान नहीं रखना चाहिए की हमारी मनोकामना खत्म कर दी गई। भक्त अपनी मनोकामना खत्म कर देते हैं और भगवान की मनोकामना को अपने ऊपर बनाए रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
अमृतवाणी-178
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जीवन साधना आवश्यक ही नहीं,अनिवार्य भी (भाग-3)
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आज दूसरी बात बताते हैं आपको। अपनी पात्रता का विकास करना पड़ेगा, पात्र इसके लिए बनना पड़ेगा। पात्र अगर न होंगे तब? शादी कोई लड़की करना चाहे किसी अच्छे लड़के से और वह बुड्ढी हो तब? गूँगी, बहरी, अन्धी हो तब? तो कौन शादी करेगा? इसीलिए पात्रता बहुत जरूरी है। कल हमने कहा था न—उस दिन आपसे कहा था, पानी का गड्ढा होना जरूरी है, बादलों की कृपा प्राप्त करने के लिए। बादल तो बरसते ही रहते हैं। उनकी कृपा तो सबके ऊपर है। गड्ढा जहाँ होगा, वहीं तो पानी जमा होगा न। गड्ढा न होगा तब? सूरज की कृपा तो हरेक के ऊपर है; लेकिन जिसकी आँखें खराब हो गई हों, उसके लिए क्या कर सकता है सूरज! दुनिया में एक से एक सुहावने दृश्य दिखाई पड़ते हैं; पर एक-से सुहावने दृश्य को देख कौन सकेगा?

🔷 जिसकी आँखों का तिल साबुत होगा, वही तो देखेगा? जिसकी आँखों का तिल साबुत नहीं है, तो कैसे देखेगा! जरा आप ही बताइये। जिसके कानों की झिल्ली खराब हो गई है, दुनिया में एक-से बढ़िया संगीत और आवाज निकलती है, पर कानों की झिल्ली खराब हो जाए, तब दुनिया के संगीत सुनने के लिए आदमी की कोई सहायता-सेवा नहीं कर सकता। आदमी का दिमाग खराब हो जाए तब? तब एक से एक बढ़िया परामर्श देने वाले, एक-से सहायता देने वाले क्या कर सकते हैं? कोई सहायता नहीं कर सकता। किसकी? जिसका दिमाग खराब हो गया है। क्या करेंगे? अपना दिमाग तो सही हो, अपनी झिल्ली तो सही हो, अपनी आँखों का तिल तो सही हो। ये सही होंगे, तो फिर सूरज भी सहायता करेगा, वायु भी सहायता करेगी।

🔶 पाँच तत्त्व दुनिया में हैं, जिसमें से हवा भी है, रोशनी भी है, सूरज भी है—ये सब आदमी की सहायता करते हैं। इन्हीं की सहायता से तो आदमी जिन्दा है; लेकिन आदमी जिन्दा तो होना चाहिए। मर गया होगा तब, साँस क्या करेगी? बहुत अच्छी प्रातःकाल की हवा है; हवा फेफड़ों को मिलनी चाहिए; पर लेगा तो तभी, जब वह जिन्दा हो। जिन्दा नहीं हो, तो क्या करेगी हवा। एक से एक बढ़िया आहार है और भोजन है; लेकिन आहार और भोजन के होते हुए अगर किसी आदमी का पेट खराब हो जाए तब? आप क्या खिला करके करेंगे? और उल्टा पेट में दर्द हो जाएगा। आप पौष्टिक पदार्थ दीजिए, मलाई-मिठाई दीजिए। अगर पेट खराब है, पचता नहीं है, तो मलाई-मिठाई क्या करेगी? और जहर पैदा कर देगी। मेरा मतलब पात्रता से है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

🔷 शबरी के जूठे बेर भगवान ने खाये थे न! गोपियों के यहाँ भगवान छाछ माँगने गए थे न! बलि के दरवाजे पर बावन अंगुल के बन करके भगवान गए थे न! कर्ण के दरवाजे पर सोना माँगने के लिए साधु और भिखारी का रूप बनाकर गए थे न! ये बड़प्पन है, भक्त का बड़प्पन। भृगु ने भगवान के सीने में लात मारी थी, कहाँ कैसे भगवान हैं! जो अपने कर्तव्य का ध्यान नहीं रखते और भगवान ने महर्षि भृगु की लात के निशान को अपनी छाती पर अभी तक सुरक्षित रखा हुआ है। विष्णु की मूर्तियों में महर्षि भृगु की लात का निशान बना रहता है। महर्षि भृगु बड़े थे भगवान से।

🔶 भक्त बड़ा होता है भगवान से; पर सही भक्त होना चाहिए। सही भक्त की कल हम आपको पहचान बता चुके हैं और ये बता चुके हैं कि भक्त को भगवान के अनुशासन पर निर्भर रहना चाहिए; भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए; अपनी मनोकामना की बाबत ध्यान नहीं रखना चाहिए की हमारी मनोकामना खत्म कर दी गई। भक्त अपनी मनोकामना खत्म कर देते हैं और भगवान की मनोकामना को अपने ऊपर बनाए रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

अमृतवाणी-177
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जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 2)
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🔷 नारद एक बार मनोकामना माँगने के लिए भगवान के पास गए और ये कहने लगे—एक युवती का स्वयंवर होने वाला है और मुझे आप राजकुमार बना दीजिये, सुन्दर बना दीजिए, ताकि मेरी अच्छी लड़की से शादी भी हो जाए और मैं सम्पन्न भी हो जाऊँ; दहेज जो मिलेगा, उससे मालदार भी हो जाऊँगा। मालदार बनने की और सम्पन्न बनने की दो ही तो मनोकामनाएँ हैं और क्या मनोकामना है? एक लोभ की मनोकामना है, एक मोह की मनोकामना है। दोनों के अलावा और कोई तीसरी मनोकामना दुनिया में है ही नहीं। इन दोनों मनोकामनाओं को लेकर जब नारद भगवान के यहाँ गए, तो भगवान के अचम्भे का ठिकाना नहीं रहा। भक्त कैसा? जिसकी मनोकामना हो। मनोकामना होगी तो भक्त नहीं होगा—भक्त होगा तो मनोकामना नहीं होगी। दोनों का निर्वाह एक साथ नहीं हो सकता।

🔶 जहाँ अँधेरा होगा, वहाँ उजाला नहीं रहेगा; जहाँ उजाला रहेगा, वहाँ अँधेरा नहीं होगा। दोनों एक साथ जोड़ कैसे होगा? इसलिए भगवान सिर पर हाथ रख करके जा बैठे। अरे! तुम क्या कहते हो नारद? लेकिन नारद ने अपना आग्रह जारी रखा—नहीं, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए, मुझे मालदार बनाइये, मेरी विषय-वासना पूरी कीजिए। भगवान चुप हो गए। नारद ने सोचा—भगवान ने चुप्पी साध ली है, शायद मेरी बात को मान लिया होगा। भगवान को माननी चाहिए भक्त की बात ऐसा ख्याल था। बस वो चले गए स्वयंवर में। स्वयंवर में जाकर के बैठे। राजकुमारी ने देखा—कौन बैठा है? नारद जी का और भी बुरा रूप बना दिया—बन्दर जैसा। राजकुमारी देखकर मजाक करने लगी, हँसने लगी; ये बन्दर जैसा कौन आ करके बैठा है? बस, उसको माला तो नहीं पहनाई और दूसरे राजकुमार को माला पहना दी।

🔷 नारद जी दुःखी हुए, फिर विष्णु भगवान के पास गए; गालियाँ बकने लगे। विष्णु ने कहा—अरे नारद! एक बात तो सुन। हमने किसी भक्त की मनोकामना पूरी की है क्या आज तक। इतिहास तो ला भक्तों का उठा करके। जब से सृष्टि बनी है और जब से भक्ति का विधान बना है, तब से भगवान् ने एक भी भक्त की मनोकामना पूरी नहीं की है। हर भक्त को मनोकामना का त्याग करना पड़ा है और भगवान की मनोकामना को अपनी मनोकामना बनाना पड़ा है। बस, कल हम ये बता रहे थे कि आप अगर उपासना कर सकते हों, तो आप भी भगवान के बराबर हो सकते हैं और उनसे बड़े भी हो सकते हैं और भगवान के गुण और आपके गुण एक बन सकते हैं; आप महापुरुष हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं, ऋषि हो सकते हैं, देवात्मा हो सकते हैं और अवतार हो सकते हैं, अगर आप उपासना का ठीक तरीके से अवलम्बन लें तो। कल का ये विषय था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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