सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-45

मन्दिर बनकर तैयार हो चुका था। सभी बन्दी भाइयों की मेहनत का परिणाम था मन्दिर का बनना। अतिउत्साह था
सभी बच्चों में। एक से बढ़कर एक थे सभी।  आखिरकार वह दिन भी आ गया, जब मूर्ति मन्दिर में आ गई। ख़ुशी का ठिकाना नहीं था सभी का। यज्ञ के बाद मूर्ति जहाँ स्थापित की जानी थी उस स्थान पर एक गढ्ढा किया गया, जहाँ लाइन से सभी बन्दियों ने पुष्प अर्पित किये, केवल फ़ूल ही नहीं ऑसुओं की धारा भी उस गढ्ढे में समर्पित की जा रही थी, सभी लोग रो रहे थे। शायद इसलिए कि साक्षात् मॉ ने उनके आने की पुकार सुनी थी और स्थाई रूप से वे अपने बच्चों के पास रहने के लिये आ गईं थीं। लगभग 1घन्टे तक यह सिलसिला चलता रहा। अधीक्षक एवं उपअधीक्षक तथा प्रशासन के और लोग भी शामिल हुये थे।
          मूर्ति के नीचे पुष्प, व अन्य चीजें विशेष रखकर स्थापित कर दी गई और कपड़े से ढक दिया गया। अब बारी थी प्राण-प्रतिष्ठा की कि प्राण प्रतिष्ठा कौन करायेगा। मन में  बस एक ही बात थी कि इतना सब कुछ झूठा प्रचार जो हमारे लिये किया जाता रहा है तो अब शान्तिकुन्ज से ही कोई आकर प्राण प्रतिष्ठा कराये। दिन-रात बस एक ही रटन कि गुरुदेव आप ही करा सकते हैं क्यों कि मन्दिर का स्वप्न आपका था, बनाया भी आपने। अग़र यह किया धरा आपका है तो फ़िर शान्तिकुन्ज से आप ही किसी को भेजें।
सोते-जागते उठते-बैठते बस एक ही ख़याल, एक ही ज़िद कि यदि सच्चे मन से बिना किसी स्वार्थ के हमने यह काम किया है तो आपको ये ज़िद पूरी करनी ही पड़ेगी। यह अब इंसानों की नहीं, भक्त और भगवान् की लड़ाई थी। रोते-बिलखते कब नींद आ जाती पता ही न चलता। एक दिन ऐसे ही सोते समय अचानक गुरुदेव के डॉटने का आभास हुआ ,स्वप्न में आकर लगे डॉटने, क्या ज़िद पकड़ रखी है ऐसे कामों के लिए तप करना पड़ता है तप ? हवा में बातें नहीं होतीं। उनके ऐसा कहते ही मन में विचार आया कि क्यों न अन्न खाना छोड़ दिया जाए और मैं एकदम से बोल उठी कि ठीक है गुरुदेव जब तक प्राण प्रतिष्ठा शान्तिकुन्ज से आकर कोई नहीं कराता, तब तक मैं अन्न नहीं खाऊँगी और इतना कहते ही मेरी नींद खुल गई, घड़ी में समय देखा तो सुबह के तीन बज रहे थे। समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हुआ। लेकिन जो भी हुआ झूठ तो हो नहीं सकता ? गुरुदेव का ऐसा मन होगा तभी उन्होंने ख़ुद मेरे मुँह से ही निकलवाया कि क्या करना है  ? और अनुष्ठान के साथ-साथ अन्न त्याग का संकल्प उन्होंने ख़ुद ही आकर करा दिया।इधर बाहर के कार्यक्रमों की झड़ी लग गई, कभी यू .पी, पंजाब, मध्यप्रदेश, हिमाचल और भी जगहों पर जाना पड़ा, समस्या यह होती कि बड़ी मुश्किल से लोगों को समझाना पड़ता कि ख़ाना नहीं खा सकते, सब्जियां उबाल कर दे दें। न जाने इतनी हिम्मत गुरुदेव ने कैसे दी। आज जब ध्यान आता है तो लगता है कि उनकी कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं।
                                    क्रमशः!!
                               'गुरुकॄपा केवलम्'
                           "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                      👣🙏

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