सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-47
"घायल की गति घायल जाने" ये कहावत सुनी तो बहुत थी लेकिन महसूस कभी नहीं की थी। इन दिनों में यह कहावत बहुत अनुभवों से हमें गुजार रही थी। जो लोग दिन रात खुशामदीद की तरह आगे-पीछे घूमते थे,बड़े-बड़े कार्यक्रमों में अपनी पहचान जताने के लिए दसियों बार जबरन पैर छूते , सामान उठाकर चलते,लोगों को यह दिखाते कि हम बहन जी के बहुत ख़ास हैं, आज अपने-अपने बिलों में घुसकर बैठे थे और झूठी अफ़वाहों को फैलाने में लगे थे, ताकि कुछ मुट्ठी भर ट्रस्टियों और अपने को दिग्गज कहलाने वाले चापलूसों की निगाह में वफ़ादार बन सकें।
वे यह भूल बैठे थे कि ये योजना गुरुदेव की थी, हम तो केवल निमित्त मात्र थे। कितनी संस्थाओं की फाइलें सचिवालय में शायद पिछले 35-40 सालों से कारागार में
अपने-अपने धर्मस्थल बनाने के लिए विचाराधीन हैं लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं आया। गुरुदेव ने किस तरह एक अतिभावनाशील अधिकारी को श्रेय देकर बन्दी भाइयों के मन की मुराद को पूरा कर दिया। ख़ैर.....
इसी बीच अहमदाबाद से नौ कुण्डीय गायत्री यज्ञ कराने का निमन्त्रण आया, हम लोग गुरुदेव का आदेश मानकर चल दिये। रास्ते में अजमेर, उदयपुर आदि जेलों में कार्यक्रम कराते हुए अहमदाबाद पहुँचे। चार दिन बाद जब वापस जयपुर लौटे तो गुरुदेव-माताजी की अनन्य कृपा का प्रसाद हमें मिलने वाला है ऐसी सूचना मिली। सन्त परम्परा के अनुयायी स्वामी नित्यानंद जी महाराज (धार म.प्र.)एवं परमपूज्य गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी के समर्पित शिष्य डा. प्रणव पण्ड्या जी के पिताजी श्री सत्यनारायण जी पण्ड्या एवं माताजी श्री मती सरस्वती जी पण्ड्या (जज साहब और बाई ) गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कराने के लिए दो दिन बाद आ रहे हैं । पहले तो लगा कि कहीं यह स्वप्न जैसा तो नहीं, क्यों कि अभी अहमदाबाद के कार्यक्रम की सफलता की ख़ुशी का नशा उतरा नहीं था। कहीं ऐसा न हो कि यह सूचना झूठ हो जाये। लेकिन यह सच था कि आदरणीय भाई साहब (डा.प्रणव पण्ड्या जी) एवं आदरणीया जीजी (श्री मती शैल बाला पण्ड्या) के सहयोग से जज साहब और बाई आने वाले थे।
हमारे पूरे परिवार में ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। जिस दिन हमें यह सूचना मिली पता नहीं नींद कहाँ खो गई। पूरी रात हम सभी ने प्रार्थना में निकाल दी कि कहीं किसी तरह की कोई अड़चन न आ जाये। दूसरे दिन कारागार जाकर तैयारियां शुरू कीं। प्रशासन को लिखित सूचना देकर अनुमति ली गई सामान अन्दर लाये जाने की तथा कार्यक्रम कराने की। दूसरी ओर कार्यक्रम में शामिल होने का पत्र भी दिया। बन्दी भाइयों को जब बताया तो सब ख़ुशी के मारे उछलने लगे, हमें समझाने लगे कि हम तो पहले ही कहते थे कि यहाँ कोई साधारण व्यक्ति प्राण प्रतिष्ठा नहीं करा सकता, ये कारागृह में बिराजी हुई गायत्री माता हैं। गुरुदेव ज़रूर किसी विशेष व्यक्ति को भेजेंगे लेकिन आप तो ख़ुद भी रोते थे और हमें भी रुलाते थे। उन सबकी ख़ुशी देखते ही बनती थी। जब तक प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सम्पन्न नहीं हो जाता तब तक अनवरत् जप का संकल्प लिया। काम व तैयारियों के साथ-साथ जप भी करते रहेंगे, ताकि सब कुछ निर्विघ्न सम्पन्न हो सके। जो कुछ भी काम नहीं कर रहे हैं वे लगातार मंत्र लेखन करेंगे।
हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख-ईसाई सभी भाइयों के हाथ दुआ में उठे थे। सब अपने-अपने तरीक़े से हमें यह विश्वास दिलाने में लगे थे कि सब कुछ बहुत शानदार और भव्य होगा,उन्हीं भाइयों में कुछ सरदार भाई थे, जो हमेशा मौसी कहकर बुलाते थे, कहने लगे मौसी जी इतना बढ़िया सब होगा कि आगे आने वाली पीढ़ियॉ भी याद रखेंगी कि मातारानी ने सबकी झोलियॉ कैसे-कैसेभर दीं। हमारी ये मॉ सबसे अलग
है।
क्रमशः!!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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