अति बैरागी-377
अति बैरागी मन किसी-किसी का
जिसे श्मशान वैराग्य भी कहते हैं
कभी-कभी ही हो पाता है
जैसे खाते-खाते मिठाई
मन ऊब जाता है और
थोड़ा सा
नमकीन खाने को
जी चाहता है
बस वही हाल इस मन का भी है
कभी संसार तो कभी वैराग्य
शरीर आत्मा से
बिल्कुल ही अलग है
फ़िर भी हम लगे रहते हैं
शरीर की चाकरी में
क्यूंकि बिना शरीर के
न सेवा संभव है और ना ही साधना
शरीर-मन-आत्मा
सबका अपना-अपना
अलग ही अस्तित्व है
और इन सभी में जकड़े हुए
भावनाओं का ज्वार
कब घुमड़ने लगता है
पता नहीं क्यों.......?
आख़िर कब तक..........!!
@शशिसंजय
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