सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-46
भक्त और भगवान की लड़ाई चालू थी और भगवान द्वारा ली जाने वाली परीक्षाएं भी चालू थीं, लेकिन इतना विश्वास ज़रूर था कि जो समय-समय पर भक्त की पुकार सुनकर दौड़े आये हैं वे हमारे लिये निष्ठुर कैसे हो सकते हैं। प्रार्थना व यज्ञों के कार्यक्रम लगातार चल रहे थे। लोग कहॉ कहॉ से बुला रहे थे और कैसे बुला रहे थे, कुछ पता नहीं।शायद गुरुदेव को हमारे प्रारब्ध काटने की और अन्न फ़िर से शुरू कराने की जल्दी रही होगी, ऐसा अब महसूस होता है, क्योंकि उन्हें भी यह एहसास रहा होगा कि उनकी बेटी खाने की बेहद शौकीन है और यह संकल्प दुखी मन से तथा अपनी ज़िद पूरी कराने के लिये किया गया है। ख़ैर जो भी हो। गुरुदेव की लीला वे ही जानें।
इसी बीच हमारे बन्दी भाइयों में एक और नाम याद आता है अशोक। वह जाति से ब्राह्मण था और यज्ञ कराना भी सीख लिया था। वह ज़्यादातर बैरकों में यज्ञ कराते-कराते अपने आपको बेहद ज्ञानी भी समझने लगा था मन्दिर बनने में ज्यादा रुचि न दिखाकर बनने के बाद भाषण देना शुरू। जब भी मौका मिलता वह हमें यह समझाने से नहीं चूकता कि डा.ॠषीकेश जो कर रहा है ग़लत है। यज्ञ आदि केवल ब्राह्मणों को कराना चाहिए और भी बहुत सी बातें।ये बालक भी ॠषीकेश की तरह हत्या के केस में ही अन्दर आया था।
एक तरफ़ वो बालक जो अपनी अटूट श्रद्धा से बीमार बन्दियों पर जप थैरिपी का प्रयोग कर रहा था, गुरुदेव का साहित्य लगातार पढ़ रहा था जब कि वह जाति से गुर्जर था वहीं दूसरी ओर वह ब्राह्मण बालक था जिसे यह चिन्ता थी कि मन्दिर का सेवा का काम किसी और को न दिया जाए ।इधर जब मन्दिर निर्माण चल रहा था उस समय प्रशासन के कुछ ब्राह्मण अधिकारी विरोधी स्वर में आपस में एवं बन्दियों से बात करने लगे कि गायत्री का मन्दिर यहाँ नहीं बनना चाहिये ये कोई पवित्र जगह नहीं है। इन गायत्री वालों को समझाओ ये ग़लत कर रहे हैं । ये सब बातें जब हम तक पहुँचती तो और मन ख़राब होता कि पूरी मेहनत हो चुकी और अब ये सबको डरा रहे हैं। इसी बीच अचानक एक बन्दी ने अन्दर आत्महत्या कर ली, अब सारा दोष मन्दिर को दिया जाने लगा।जबकि हत्या या आत्महत्या कोई पहली घटना नहीं थी लेकिन प्रशासन ने हमें यज्ञ सम्पन्न होने के बाद बुला भेजा।
डिप्टी जेलर जो ब्राह्मण थे तथा सबसे ज़्यादा अफ़वाहों का बाज़ार गर्म कर रहे थे उन्होंने अधीक्षक महोदय की ओर इशारा करते हुए कहा कि मैडम साहब कह रहे हैं कि ये मन्दिर ग़लत बना है इससे जेल में आये दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं । अधीक्षक महोदय बोले-अरे बहन जी ये मूर्ति ग़लत दिशा में लग रही है ऐसा डिप्टी साहब बता रहे हैं। उनके कहने के बाद मैंने उन्हें कहा कि हमारा जो मुख्य गुरुद्वारा शान्तिकुन्ज में है वहॉ से पता करके बताती हूँ ।चूंकि अधीक्षक बदल चुके थे ये नये आये थे इसीलिए जूनियर्स
उन्हें बरगलाने में लगे थे। ख़ैर....
उन्होंने कहा कि आप एक बार पता कर लें। बहुत ही मानसिक परेशानी हो रही थी। घर आने के बाद डा. प्रणव पण्ड्या जी भाई साहब को फ़ोन किया सारी घटना बताई तो उन्होंने समझाया कि घबराने की कोई बात नहीं है। उनसे कहना कि गायत्री माता का जेलमें आना शुभ संकेत है।उनसे सबका भला ही होगा और दिशा भी ठीक है ग़लत नहीं है। भाई साहब से बात करने के बाद मन में राहत महसूस हुई और ये विश्वास भी प्रबल हुआ कि अब सब अच्छा ही होगा। अगले रविवार को जब जेल पहुँचे तो यज्ञ के बाद अधीक्षक महोदय को प्रणव भाई साहब द्वारा कही गई सारी बात बताई और यह भी बताया कि ये कोई और नहीं गुरुदेव के अनन्य भक्त उनके दामाद ही हैं जो गायत्री परिवार के इस मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं, गुरुदेव माताजी ने शैल जीजी (अपनी बिटिया और दामाद) के हाथों में इतनी बड़ी बागडोर सौंपी है। सुनकर खुश हो गये और बोले-अच्छा बहन जी अब कोई डर नहीं, आप तो कराओ प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम, ये लोग सब मेरा दिमाग ख़राब कर देते हैं बार बार बता बता कर। अब फ़िर वही समस्या कि प्राण प्रतिष्ठा कौन करायेगा।
क्रमशः!!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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