अमृतवाणी-182

ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली सवा लाखी सवाल है-‘मैं कौन हूँ?’ जिसका जवाब आपको आत्मसाक्षात्कार दिला सकता है। यह सवाल आपके सारे दुःखों और समस्याओं को एक साथ विलीन कर आपको आनंद का अनुभव करवा सकता है। इस सवाल के उठते ही यह परम सत्य याद आ जाता है कि मैं शरीर नहीं, सेल्फ हूँ। जो कुछ भी मेरे साथ हो रहा है, वह मात्र इसलिए है क्योंकि सेल्फ अपनी उच्चतम संभावना खोलना चाहता है। जो भी घटनाएँ आ रही हैं, वे इसलिए आ रही हैं ताकि मेरी सही ट्रेनिंग हो सके, मेरा विकास हो सके, मैं कुछ बातें सीख पाऊँ, खुद में नए गुण विकसित कर पाऊँ।
जीज़स ने अपने शिष्यों से कहा था, ‘तुम खुद को हीन और दरिद्र क्यों समझते हो? क्या तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारे अंदर प्रभु का राज्य है... किंगडम ऑफ गॉड तुम्हारे अंदर ही है, फिर तुम क्यों दुःखी होते हो?’ कारण- इंसान अपनी असली पहचान भूलकर, दिखावटी सत्य में उलझकर कहता है, ‘मुझे यह दुःख क्यों आया, वह परेशानी क्यों आई... मेरे कभी काम ही नहीं बनते, अड़चनें ही आती रहती हैं... उसने यह कह दिया... इसने यह कर दिया... मेरा यह पैटर्न टूट ही नहीं रहा... मुझसे यह होता ही नहीं... मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ... ’ आदि। दिखावटी सत्य में फँसकर जब भी मन में ऐसी कोई बात उठे तब तुरंत सही सवाल पूछें- ‘मैं कौन हूँ? इस वक्त मैं क्या बनकर सोच रहा हूँ?’ यह सवाल आपको सीधे अंतिम सत्य से जोड़ देगा। फिर आपका दुःख, दुःख नहीं बल्कि एक खेल बन जाएगा, जिसे आप खेल भावना से ही खेलेंगे। जब निवृत्तिनाथ को अपने गुरु गहनीनाथ द्वारा और ज्ञानदेव को अपने गुरु निवृत्तिनाथ द्वारा अपनी मूल पहचान मिली तब फिर उन्हें कभी कोई दुःख, दुःख नहीं लगा। इसलिए वे उस समाज के प्रति भी प्रेम और करूणा से भर उठे, जिन्होंने उन्हें बहुत सताया था। आगे उनका पूरा जीवन इसी प्रयास में बीता कि लोगों को ज्ञान की आँख कैसे मिले, उनके जीवन का अज्ञानरूपी अंधकार कैसे दूर हो। उन्होंने आजीवन मानव समाज की निःस्वार्थ सेवा की। यहाँ तक कि उनके लिए संजीवनी समाधि लेकर, अपनी मृत्यु को भी निमित्त बनाया ताकि उनकी मृत्यु भी लोगों से मनन करवा सके।
                           साभार!!
                           "सन्त ज्ञानेश्वर"
          "समाधि रहस्य और जीवन चरित्र पुस्तक से"

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426