गुरुगीता-89
गुरु और शिष्य का संबंध तमाम सांसारिक रिश्तों में श्रेष्ठ और ऊपर माना गया है। संकटमोचक श्री हनुमान के गुरु सूर्य थे जिन्होंने श्री राम के संबंध में सारा तत्व एवं भक्ति भाव बतलाया । पूर्णिमा तिथि पर श्री हनुमान उपासना शुभ मानी जाती है। क्योंकि श्री हनुमान का जन्म भी पूर्णिमा तिथि पर माना गया है। श्री हनुमान से गुरु की आज्ञा मानकर उनके चरित्र का स्मरण, सफल जीवन के लिए मार्गदर्शन ही नहीं करता है, बल्कि संकटमोचक भी साबित होता है।
गुणी और ताकतवर होने पर भी हनुमान घमण्ड से दूर रहे। सीख है कि किसी भी रूप में अहं को जगह न दें। हमेशा नम्रता और सीखने का भाव मन में कायम रखें।
श्री हनुमान ने हर रिश्तों को सम्मान दिया और उसके प्रति समर्पित रहे, फिर चाहे वह माता हो, वानर राज सुग्रीव या अपने इष्ट भगवान राम । संदेश है कि परिवार और अपने क्षेत्र से जुड़े हर संबंध में मिठास बनाए रखें। क्योंकि इन रिश्तों के प्रेम, सहयोग और विश्वास से मिली ऊर्जा, उत्साह और दुआएं आपकी सफलता तय कर देती है।
श्री हनुमान से धैर्य और निडरता का सूत्र जीवन की तमाम मुश्किल हालातों में भी मनोबल देता है। इसके बूते ही लंका में जाकर हनुमान ने रावण राज के अंत का बिगुल बजाया।
जीवन में दंभ रहित या आत्म प्रशंसा का भाव पतन का कारण होती है। श्री हनुमान से कृतज्ञता के भाव सीखकर जीवन में उतारे। अपनी हर सफलता में परिजनों, इष्टजनों और बड़ों का योगदान न भूलें। जैसे हनुमान ने अपनी तमाम सफलता का कारण श्रीराम को ही बताया।
श्री हनुमान ने सीता खोज में समुद्र पार करते वक्त सुरसा, सिंहिका, मेनाक पर्वत जैसी अनेक बाधाओं का सामना किया। किंतु लालसाओं में न उलझ बुद्धि व विवेक से सही फैसला लेकर अपने लक्ष्य की ओर बढें। आप भी जीवन में सही और गलत की पहचान कर अपने मकसद से कभी न भटकें।
श्री हनुमान ने अपने स्वभाव व व्यवहार से हर स्थिति, काल और अवसर से तालमेल बैठाया। इससे ही वे हर युग और काल में सबके प्रिय बने रहे। हनुमान के इस सूत्र से आप भी अपने बोल, व्यवहार और स्वभाव में सेवा व प्रेम के रूप में मिठास घोलें। इन सूत्रों से आप सभी का भरोसा और दिल जीतकर सफलता की ऊंचाइयों को पा सकते हैं, ठीक श्री हनुमान की तरह। अपने गुरु और अपने ईष्ट के प्रति समर्पण ही शिष्य को ऊँचा उठा सकता है ।
गुरुगीता पाठ
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संसारमलनाशार्थम् भवथापनिवृतातय।
गुरुगीताम्भसि स्नानंsतत्वज्ञ: कुरुते सदा ।।
अर्थ
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तत्वविद् लोग संसार मल अर्थात् बहुदर्शन दोष नाश और भवताप निवृत्ति के लिए इस गुरुगीता रूपी जल में सदा स्नान करते हैं ।
श्रेष्ठ व्यक्ति के आचरण का अनुकरण दूसरे लोग करते हैं। अग़र तत्वज्ञ लोग गुरुगीता पाठ करें तो और भी विताप में तापित लोग भी इसका पाठ करेंगे। उससे उन लोगों को संसारमल नाश और भवताप निवृत्ति होगी।।95।।
95.
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Those who have realised the Tatva, wash the dirt of the world i.e.the defect of multiplicity of vision and for the relief of worldly agonies, always bathe in the waters
of Guru Geeta.
COMMENTS:
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People with perfect character set examples,
which others follow. If the realised ones will recite Guru Geeta those who are agonised by the three types of miseries shall also recite
this and will be relieved of the dirt and agonies of the world.
👣🙏
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