दिले शायरी-77
---तेरे प्यार औ तेरी इबादत का नशा,
कुछ इस क़दर चढ़ा है मुझको,
कि रगड़ता हूँ जितना,
उतना ही खिल उठता है!!
---बैसाखियॉ छुड़ाकर तुमने,
ऊँगली पकड़ ली मेरी,
तुम जिधर चला देते हो,
उधर ही चल पड़ता हूँ!!
---मॉ ने मुझको नाम दिया और
तुमने मुझको खड़ा किया है,
मेरे गुरुवर कैसे भूलूँ,
कितना जो उपकार किया है!!
---भटकने की जो आदत है मेरी,
वो सदियों पुरानी है,
पहले भटकने पर छटपटाता था,
आज भूलने पर रास्ता,
तुम ख़ुद ही थाम लेते हो!!
---खोलता हूँ जब अतीत के पन्नों को,
तो ख़ुद चौंक जाता हूँ,
तुमने हाथ पकड़ते ही,
नर्क से सीधा स्वर्ग में ला खड़ा किया!!
@शशिसंजय
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@शशिसंजय
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