गुरुगीता-97
समर्थ रामदास स्वामीजी की ख्याति सुनने पर छत्रपति शिवाजी महाराज जी को उनके दर्शन की लालसा हुई । उनसे मिलने के लिए वे कोंढवळ गए । वहां भेट होगी इस आशा से सायंकाल तक रुके, तब भी महाराजजी की स्वामीजी से भेंट नहीं हुई । तत्पश्चात प्रतापगढ आनेपर रात में नींद में भी महाराजजी के मन में वही विचार था । समर्थ रामदास स्वामीजी जानबूझकर महाराजजी से मिलना टाल रहे थे । ऐसे ही कुछ दिन निकल जानेपर एक दिन समर्थजी के दर्शन की लालसा अत्यधिक बढ़ने से वे भवानीमाता के मंदिर गए । उस रात शिवाजी महाराज जी वहां पर ही देवी के सामने निद्राधीन हो गए । रात में स्वप्न में उन्हें पैर में खडांऊ, देहपर भगवा वस्त्र, हाथ में माला, बगल में कुबडी ऐसे तेजस्वी रूप में समर्थ रामदास स्वामीजी के दर्शन हुए । छ. शिवाजी महाराज जी ने उन्हें साष्टांग नमस्कार किया । समर्थजी ने उनके सिरपर हाथ रखकर उन्हें आशिर्वाद दिया । नींद में से जागनेपर महाराजजी ने देखा तो उनके हाथ में प्रसाद के रूप में नारियल था । उस समय से वे समर्थ रामदास स्वामीजी को अपने गुरु मानने लगे ।
आगे छ. शिवाजी महाराजजी ने अत्यधिक पराक्रम करने पर समर्थ रामदास स्वामीजी ने स्वयं शिंगणवाडी प्रत्यक्ष आकर महाराज जी को दर्शन दिए । शिवाजी महाराज जी ने उनकी पाद्यपूजा की । समर्थजी ने उन्हें प्रसाद के रूप में एक नारियल, मुठ्ठीभर माटी, लीद एवं पत्थर दिए । उस समय महाराजजी के मन में आया कि़, ‘हमें राज्यकारभार का त्याग कर समर्थजी की सेवा करने में शेष आयु लगानी चाहिए । समर्थजी महाराज जी के मन का यह विचार समझ गए और उन्होंने कहा ‘राजा, क्षत्रिय धर्म का पालन कीजिए । प्राण जानेपर भी धर्म का त्याग न करें । प्रजा के रक्षण के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है, वह छोड़कर यहां सेवा करने के लिए न रहें । मेरा केवल स्मरण करनेपर भी मैं आपसे मिलने आऊंगा । सुख से, आनंद से राज्य कीजिए’ । तत्पश्चात् समर्थजी ने उन्हें राज्य करने की आदर्श पद्धति समझाई । समर्थजी ने शिवाजी महाराज जी को उनके कल्याण के लिए नारियल दिया था । सर्वथा संतुष्ट एवं तृप्त मन से छ. शिवाजी महाराज जी राज्य करने लगे । महाराज जी ने माटी अर्थात पृथ्वी, पत्थर अर्थात गढ़ जीता एवं लीद अर्थात अश्वदल से भी समृद्ध हो गए । गुरु के कृपा प्रसाद से शिवाजी महाराज जी को किसी वस्तु का अभाव नहीं रहा ।
छ. शिवाजी महाराजजी ने विदेशी शत्रुओं का नाश करके स्वराज्य की स्थापना करने का जो कार्य आरंभ किया था उसपर समर्थजी को अत्यधिक अभिमान था । वे लोगों को छत्रपती जी के कार्य में सहायता करने तथा शक्ति संपादन करके स्वराज्य एवं धर्मरक्षण के लिए लड़ने का उपदेश करते थे । छ. शिवाजी महाराज जी की समर्थजी के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी । अनेक प्रसंगों में महाराज जी समर्थ रामदास स्वामीजी का विचार एवं आशीर्वाद लेते थे । आपातकाल में हमें सतर्कता कैसे बरतना चाहिए, इस संदर्भ में समर्थजी द्वारा छ. शिवाजी महाराज जी को दिया गया उपदेश ‘दासबोध’ नामक ग्रंथ में है । उसमें समर्थजी कहते हैं, ‘सदैव सतर्कता से रहकर आचरण करें, शत्रु-मित्र को ठीक से परखें, एकांत में अत्यधिक विचार कर योजना बनाएं, निरंतर प्रयास करते रहें । इसके पूर्व अनेक महान लोग हो गए, उन्होंने अत्यधिक बुरी स्थिति तथा कष्ट सहन किए हैं । आलस का त्याग कर, बिना कष्ट के अनेक लोगों से मित्रता कर के कार्य करते रहें’।
छ. शिवाजी महाराज जी को समर्थ रामदासस्वामीजी से मिलने की लालसा थी । उनकी तीव्र उत्कंठा से उन्हें स्वप्न में एवं तदुपरांत प्रत्यक्ष समर्थ रामदास स्वामीजी के दर्शन हुए । उत्कंठा से हम किसी भी लक्ष्य को साध्य कर सकते हैं ।
समर्थ गुरु शिष्य के लिए स्वयं उसके पास चलकर आते हैं यदि शिष्य की लालसा एवं उन्हें पाने की उत्कंठा हो !
गुरुगीता पाठ
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आजन्म कोट्यामं देवेशि जपव्रततप: क्रिया:।
तासां सर्वफलं देवि गुरुसन्तोषमात्रत: ।।103।।
अर्थ
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हे देवि! हे देवेशि! देवियों में श्रेष्ठा, कोटि जन्म कृत जप,व्रत, तपस्या, पूजा आदि का सब फल गुरु के सन्तोष से ही गुरु सेवी लाभ करता है। इस जन्म में किया हुआ जप, व्रत,तपस्या, पूजा, आदि तो तुच्छ बात है, कोटि जन्म कृत जप व्रतादि का फल मात्र गुरु के सन्तुष्ट होने पर ही शिष्य लाभ करता है। इससे यह
कहा गया है कि जिस कर्म से गुरु सन्तुष्ट होते हैं अनन्य
कर्मा होकर उसी कार्य का अनुष्ठान करना गुरु भक्त शिष्य का कर्तव्य है ।।103।।
103.
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Oh, Devi, Oh Goddess of all the Goddesses you are par excellence. The fruits of all the Japas, Fasts ascetic practices, the worship performed in millions of births, are attained by the devotes of the Master by the contentment of the Master.
COMMENTS:
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The Japas, fasts ascetic practices, worships performed in this world in this birth are negligible. The results of fruits of all these things performed in millions of births can be obtained by the disciple if the Master is satisfied. It has been stressed here what
pleases the Master must only be performed by the disciple and this is his sacred duty.
👣🙏
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