अद्भुत आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक-26

10 अक्टूबर 1983 के ब्रह्ममुहूर्त  के वे पल मुझसे भुलाये नहीं भूलते। पूज्य गुरुदेव ने आत्मीयतापूर्वक
कहा था-
"बेटा,  तू मेरा काम कर और मैं तेरा काम करूँगा।"
         प्यार के रंग में रंगे पूज्य गुरुदेव के ये शब्द आज भी उन क्षणों में गूँज उठते हैं, जिन क्षणों में मेरे जीवन की कोई जटिल समस्या मुझे पंगु बना देती है।पूज्य गुरुदेव के संरक्षण में जब मैंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की तो मेरे जीवन में कई तरह के उतार- चढ़ाव आये। पिताजी, माताजी के देहावसान के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी मेरे ही कंधों पर आ गई।
                   पूज्य गुरुदेव के सानिध्य में आने के 23 साल बाद की बात है। पिछले  कुछ समय से बीमार चल रही मेरी पत्नी श्री मती कलावती देवी की डॉक्टरी जॉच से पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया है। तब तक  यह असाध्य बीमारी आखिरी स्टेज में पहुँच चुकी थी, इसलिए सभी प्रयासों के बावजूद उनका देहान्त हो गया । यह 6 अक्टूबर 2006 का दिन था।
                    अब पूरे परिवार की देख-रेख की जिम्मेदारी मुझ अकेले के कन्धों पर आ गई थी। एक ओर मेरी बेटी सुषमा विवाह के योग्य हो चुकी थी और दूसरी ओर दो छोटे-छोटे बच्चों के पालन-पोषण का उत्तरदायित्व भी मुझे ही वहन करना था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि नौकरी की आठ घन्टे की ड्यूटी पूरी करने के बाद घर के इतने सारे काम अकेले कैसे कर पाऊँगा। ख़ैर,  जैसे-तैसे सुबह से देर रात तक अपने शरीर का दोहन करता हुआ मैं इन बच्चों के लालन-पालन में लगा रहा,लेकिन इतने पर ही बस नहीं हुआ। दुर्भाग्य मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ा था। इन दायित्वों के निर्वाह के दौर में प्रारब्ध ने मेरी एक और कठिन परीक्षा ली।
                    घटना सन् 2009 की है। अक्टूबर का महीना था। हजारीबाग की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. निधि सरन ने बताया कि मुझे प्रोस्टेट के साथ किडनी में इंफेक्शन की शिकायत है।
                 घर में छोटा बेटा नरेन्द्र और बेटी सुषमा ही थी। मेरी बीमारी की बात सुनकर दोनों सकते में आ गये। उन्होंने मेरे जीवन की रक्षा के लिए भीगी ऑखों से पूज्यवर को याद किया और मुझे रॉची के एक अस्पताल में भर्ती कराया। यहीं पर शुरू हुई नियति के साथ पूज्य गुरुदेव की जंग।
             यहाँ आकर उपचार के दौरान मेरी तबियत ठीक होने के बजाय और भी बिगड़ती चली गई। अन्त में मुझे वहॉ के डॉक्टरों की सलाह पर 10 नवम्बर 2009 को रॉची के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेरा अन्त निकट आया जानकर मेरे परिवार के लोग मुझे देखने के लिये हॉस्पिटल आने लगे। नैफ्रोलॉजिस्ट मुझे नित्य 4 घन्टे डायलिसिस पर रख रहे थे। एक दिन अस्पताल के डॉ. घनश्याम सिंह ने बताया कि किडनी की स्थिति बहुत ही खराब हो चुकी है। इन्हें बदलवाकर ही मरीज को जिन्दा रखा जा सकता है, वह भी कुछ समय के लिए। यह सुनकर मेरे बच्चों की स्थिति ऐसी हो गई, मानो उनके ऊपर पहाड़ टूट पड़ा हो।
             अपोलो के इलाज से निराश होकर श्रद्धेया शैल जीजी व श्रद्धेय डॉ.प्रणव पण्ड्या जी को इस विपत्ति के बारे में फोन पर बताया गया। उन्होंने कहा कि प्राण रक्षा के लिए वे हम सबके आराध्य देव आचार्य श्री एवं वन्दनीया माताजी से प्रार्थना करेंगे।इधर गायत्री शक्तिपीठ, हजारीबाग के समस्त परिजन भी मेरे स्वास्थ्य लाभ के लिये गायत्री उपासना करने लगे।
       सामूहिक रूप से की जारहीउपासना-प्रार्थना 16 नवम्बर को फलीभूत हुई। दोपहर का समय था। मुझे आभास हुआ कि पूज्य गुरुदेव व माताजी मेरे सिरहाने के पास आकर मेरा सिर सहला रहे हैं। पूज्य गुरुदेव का स्नेहिल स्पर्श पाकर मेरी ऑखों से ऑसुओं की धार फूट पड़ी। मुझे सान्त्वना देते हुए उन्होंने कहा- "बेटा हॉस्पिटल बदलो। कहॉ जाना है, कब जाना है, किससे मिलना है, इन सबकी व्यवस्था हमने कर दी है।"   
       परिवार के लोगों ने किडनी ट्रांसप्लॉटेशन के लिए देश के नामचीन अस्पतालों से संपर्क करना शुरू कर दिया था। अंततः मुझे क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, सी.एम.सी., वैल्लूर ले जाने का निर्णय लिया गया। जैसे-तैसे हम वैल्लूर पहुँचे।
               वैल्लूर हॉस्पिटल जाकर पता चला कि किडनी ट्रांसप्लॉटेशन के विशेषज्ञ डॉक्टर से एक सप्ताह बाद मुलाक़ात हो पायेगी। यहीं प्रारंभ हुई गुरुवर की लीला। मैं व्हील चेयर पर बैठा युगॠषि का  ध्यान करने लगा। इसी बीच मेरे बेटे नरेन्द्र को ऐसी अन्त:प्रेरणा हुई कि वह बिना किसी की अनुमति लिये मेरे व्हील चेयर को दौड़ाते हुये नेफ्रोलॉजी विभाग पहुँचा और विभाग के प्रभारी डॉ.राजेश जॉसेफ के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
            डॉ. जॉसेफ ने हमें देखकर असहज भाव से पूछा-क्या बात है  ? नरेंद्र ने रॉची के अपोलो में चले इलाज से लेकर अब तक की स्थिति की जानकारी देते हुए उनसे किडनी ट्रान्सप्लॉन्ट करने की प्रार्थना की और अपोलो हॉस्पिटल की रिपोर्ट की फाईल उनके आगे रख दी।
            डॉ. जॉसेफ ने रिपोर्ट देखकर कहा-"चिन्ता की कोई बात नहीं है। सब ठीक हो जाएगा।" दरअसल
कल से ही मुझे आप जैसे किसी मरीज के आने का स्पष्ट पूर्वाभास हो रहा था। मुझे लग रहा था कि अगले दिन अकस्मात आने वाले किसी मरीज की अविलम्ब चिकित्सा के लिए प्रभु मुझे प्रेरित कर रहे हैं। सच पूछिये तो आज सुबह से मैं आप लोगों की ही प्रतीक्षा कर रहा था। इतना कहते हुए वे स्वयं अपने हाथों से मेरा व्हील चेयर सँभालकर डायलिसिस कक्ष की ओर चल पड़े।
          लगभग 4 घन्टे तक डायलिसिस चलने के बाद मुझे बाहर लाया गया। डॉ. जॉसेफ ने नरेंद्र से मुस्कराते हुए कहा कि अब किडनी ट्रान्सप्लॉन्ट करने या भविष्य में कभी डायलिसिस पर रखने की नौबत नहीं आयेगी।
कुछ ही दिनों में ये पूरी तरह से स्वस्थ हो जायेंगे।
              सवेरे-सवेरे डॉ.जॉसेफ ने फ़ोन पर निर्देश देकर ब्लड के विभिन्न टेस्ट करवाये। रिपोर्ट बता रही थी कि सुधार की प्रक्रिया तेजी से शुरू हो चुकी है। तीन दिन बाद पुनः ब्लड टेस्ट हुआ, रिपोर्ट आश्चर्यचकित करने वाली थी। अब तक मैं व्हील चेयर से उठकर कुछ कदम टहलने लायक हो चुका था। इस बीच कभी डायलिसिस पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। 25 दिसम्बर को डॉ. जॉसेफ ने अपने जन्मदिन पर एक समारोह का आयोजन किया। इसमें मेरा बेटा नरेन्द्र भी आमन्त्रित था।
                   उन्होंने नरेन्द्र के समक्ष इस तथ्य का उद्घाटन किया कि 4 घन्टे तक चली मेरी गहन चिकित्सा के दौरान कोई दैवी शक्ति उन्हें लगातार प्रोत्साहन तथा दिशा निर्देश दे रही थी। डॉ.जॉसेफ की  बातें सुनकर भाव विह्वलता में नरेंद्र की ऑखें मुँद गईं।उसे लगा कि सामने गुरुदेव खड़े होकर मुस्करा रहे हैं और उनका दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर उठा है।

प्रस्तुति: शिवनारायण साहू,
तारपीन,हजारीबाग (झारखण्ड)
(अद्भुत आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से पृष्ठ 10)

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